वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी यादें मेरी कुछ हरकत करती तो होगी वो खिड़की के परदे पे परछाईं मेरी देख कर ठंडी आहें वो भरती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
कोई शक़्स गर बगल से निकल जाये तो अंदाज़ में जिसके मेरी झलक आये तो नज़रें चुराकर वो पल्लू की आड़ से उसकी सूरत पे वो गौर करती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
उस नुक्कड़ पे जहां मिल ही जाता था मैं वो ही धुन जो कभी गुनगुनाता था मैं आज भी उन दीवारों से टकरा टकरा कर गूँज कर उसके दिल में उतरती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
कोई वाक़िफ़ यकायक ही भिड़ जाये जो सवाल ये पेचीदा सा छिड़ जाये जो पूछ ले वो यहां फिरने का असली सबब इस ख़याल से थोड़ा वो डरती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
वो पूछती नहीं और मैं भी कहता नहीं उस गली में मगर अब मैं रहता नहीं ढून्ढ ले जा पर गली में मेरी रूह को वो वहीँ तेरा इंतज़ार करती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी