कभी ज़रुरत तुम्हें पड़े तो
हमारे दर को याद न करना
उजड़ रहा जो तुम्हारे गम में
उस दिल को बर्बाद न करना
वही मुहब्बत जिसे दफन कर
आखिर अब हम संभल रहे हैं
उसी कब्र पे फूल चढ़ा कर
कोई नया फसाद न करना
मुहब्बतों पे शेर लिखे थे
जफ़ाओं पे जो बली चढ़े हैं
महफिलों में कभी सुनो तो
मचल के फिर इरशाद न करना
बंधा के खुद को हम बेड़ियों में
समझौतों में जो जी रहे हैं
इन बंधनों में सुकून है अब
इनसे तुम आज़ाद न करना
हुई है तुमसे जो भूल अब वो
सुधरने की गुंजाइश कम है
सुधारने का जो मन बने तो
मुआफी की फ़रियाद न करना
कभी जो मुझसे नज़र मिले तो
शर्म से आँखें झुकाना मत तुम
खता जो की है गिला तुम उसका
इन हरकतों के बाद न करना