Saturday, April 12, 2025

याद न करना yaad na karna

कभी ज़रुरत तुम्हें पड़े तो

हमारे दर को याद न करना

उजड़ रहा जो तुम्हारे गम में  

उस दिल को बर्बाद न करना

वही मुहब्बत जिसे दफन कर

आखिर अब हम संभल रहे हैं

उसी कब्र पे फूल चढ़ा कर

कोई नया फसाद न करना  

मुहब्बतों पे शेर लिखे थे

जफ़ाओं पे जो बली चढ़े हैं

महफिलों में कभी सुनो तो

मचल के फिर इरशाद न करना

बंधा के खुद को हम बेड़ियों में 

समझौतों में जो जी रहे हैं

इन बंधनों में सुकून है अब

इनसे तुम आज़ाद न करना

हुई है तुमसे जो भूल अब वो

सुधरने की गुंजाइश कम है

सुधारने का जो मन बने तो

मुआफी की फ़रियाद न करना 

कभी जो मुझसे नज़र मिले तो 

शर्म से आँखें झुकाना मत तुम

खता जो की है गिला तुम उसका

इन हरकतों के बाद न करना