ये क्या मांग लिया केकई ने
मर्यादा को पार किया
ममता की हुंकार सुनी और
रामचंद्र पे वार किया
नियम नहीं तोड़े अपने
वरदानों का भोग था वो
उसकी नियति में उपयुक्त
समय का संजोग था वो
उसको हम ठहराएं दोषी
दृष्टिकोण अपना अपना
महत्वाकांक्षा ने जिसकी
देखा स्वार्थ भरा सपना
भाग्य से जो लड़ना हो तो
संघर्ष तो करना होगा
निःस्वार्थता की देवी को
कई बार मरना होगा
साम दाम और दंड भेद हैं
हर एक केकई के हथियार
उसका सच है उसका सपना
व्यर्थ है अन्य हर विचार
कसौटी जब ममता की हो
तो केकई के इस व्यवहार
में दिख जायेगा तुमको भी
एक माँ का असीमित प्यार
रामचंद्र ने भी केकई को
इसी लिए सम्मान दिया
हम ही उसको दुष्ट माने और
खलनायक का स्थान दिया