उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है
उजिआलों में जश्न मनें और अंधेरों में मस्ती है
तूफानों में पतंग उड़ाएं बरसातों में मेले हैं
यारों की टोली होती हैं, और यारी के रेले हैं
खुशियों के बाज़ार लगें हर चीज़ वहां पे सस्ती है
उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है
नाकामी के बोझ बिना तो हर एक शक़्स इतराएगा
ऐसा है माहौल वहां के जो चाहेगा पायेगा
हर खिड़की पे लटक रहे हैं रंग बिरंगे सपने भी
हाथ बढ़ाओ और पकड़ लो, प्यारों के और अपने भी
साम दाम और दंड भेद की डूब रही हर कश्ती है
उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है
दौड़ रहा मैं देखो कैसे उस बस्ती तक जाने को
उस जन्नत की रंगरलियों को सबके साथ मनाने को
मेरी मंज़िल का ठिकाना उस उफ़ुक़ के आगे है
पर ये कम्बख्त उफ़ुक़ मेरे आगे आगे भागे है
उस बस्ती की एक झलक को मेरी आँख तरसती है
उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है
तूफानों से जूझ रहा मैं, बरसातों में भीग रहा
साम दाम और दंड भेद के सारे सबब सीख रहा
छीना छपटी सपनों की है, मैं भी तो इस होड़ में हूँ
पा जाने की दौड़ लगी है, मैं भी तो इस दौड़ मैं हूँ
ऐसे ही सारी दुनिया इस माया जाल में फस्ती है
उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है