Monday, January 31, 2022

ख़ास धूप

 वो धूप थोड़ी ख़ास थी

कैसे बयां करूँ

बहुत दिनों से आस थी 

कैसे बयां करूँ

कुर्बत के एक सिरे को

पकडे खड़ा था मैं

अरसे से इसी  ज़िद्द पे

जमकर अड़ा था मैं 

आज तू भी कितने पास थी

कैसे बयां करूँ 


उमंगों की महफ़िल थी 

कैसे बयां करूँ 

अदाएं तेरी कातिल थीं 

कैसे बयां करूँ 

जज़्बातों के मज़मून 

किताबों से पढ़ दिए

तस्वीरों से वो लम्हे 

यूँ यादों में जड़ दिए 

उस टीले पे झिलमिल थी 

कैसे बयां करूँ 

 

बातों में एक रुझान था 

कैसे बयां करूँ

रूमानी आस्मान था 

कैसे बयां करूँ 

चाय के गर्म प्याले का 

नसीब देख लो 

चुस्की भी लेलो चाव से

और हाथ सेख लो 

मेरा भी वो अरमान था

कैसे बयां करूँ 


Wednesday, January 12, 2022

आलिंगन

 ललक लड़कपन की लाये

हलचल ह्रदय की हर्षाये

वर्षों विलम्बित और वंचित

संयोगता से सुसंचित

मधुर मिलन मंशानुसार 

सुदृढ़ हुआ ये साक्षात्कार    


तृष्णा तेरी, मेरा तर्पण

दृष्टि तेरी, मेरा दर्पण 

अर्चन तेरी, मेरा अर्पण 

मीठा मनोभावित मिश्रण 

सरल संभावों का स्पंदन

है आलोकिक ये आलिंगन 


Saturday, January 8, 2022

मसला इतना गंभीर नहीं

 मसला इतना गंभीर नहीं

चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं

इज़हार-ए-मुहब्बत तो है पर

कोई पत्थर पे लकीर नहीं

     

मौसम बदलते हैं दिल के

तू चार कदम तो चल मिल के

इसमें तो कुछ तक़रीर नहीं 

मसला इतना गंभीर नहीं


बहक जाते हैं सबके मन

तू भी दिखाले अपनापन 

मैं संत नहीं तू पीर नहीं

मसला इतना गंभीर नहीं


तौबा के ये हालात मिलें

के इश्क़ मुझे खैरात मिले 

आशिक़ हूँ मैं, फ़क़ीर नहीं

मसला इतना गंभीर नहीं 

चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं