Friday, December 30, 2016

रुखसत

यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी
ये मुहब्बत कल के बाद ... रहेगी
हर सितारा यहां चमके आसमां में
जश्न बनता रहे इस कारवां में
दिल से मेरी ये फ़रियाद रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

किस किस का बताऊँ आभार है मुझपर
कुछ सिगरेट कुछ दुआओं का उधार है मुझपर
ये entry मेरे खाते में आबाद रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

creatives को ideas मैंने भी सुनाये
jingles के options मैंने भी दिखाए
वो मेरी ही किताबों की जायदाद रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

planning तो अपना इलाका है सोचा
इस thinking में भी निकला एक बड़ा लोचा
planning मेरी thinking से आज़ाद रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

servicing वाले तो इतने धूर्त नहीं हैं
पर  हैं?? उनको भी मेरी ज़रुरत नहीं है
यह मंडली भी बिना उस्ताद रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

Finance ने उलझाई मेरी कई रातें
Q2 और Q3 की टेढ़ी मेढ़ी बातें
ये learning WPP की सौगात रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

lunch table का यहाँ है स्पेशल mention 
हंसी के ठहाकों में धुलती थी tension 
अब मेरी तो lunch break बर्बाद रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी
ये मुहब्बत कल के बाद ... रहेगी
हर सितारा यहां चमके आसमां में
जश्न बनता रहे इस कारवां में
दिल से मेरी ये फ़रियाद रहेगी
यारों ये रुखसत मुझे याद रहेगी

Wednesday, November 23, 2016

कुछ ख़ास नहीं

कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं
यूहीं ख़यालों में मुस्कुराती हो
सपनों में आती जाती हो
कई जस्बात जगाती हो
जिनके लिए अलफ़ाज़ नहीं
कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं
टूटी फूटी यादें भी हैं
सपने रंगीन कुछ सादे भी हैं
कुछ मंज़िलों के इरादे भी हैं
कुछ दूर सही, कुछ पास नहीं
कुछ कहना है तुमसे
मगर कुछ ख़ास नहीं
चाहत भी है, सुकून भी है
शायरी में मेरा कुछ खून भी है
ठहराव भी है और जुनून भी है
शायद तुम्हे एहसास नहीं
कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं

Friday, November 18, 2016

मेरे जाने के बाद


कुछ अश्रु तो गिरेंगे
मेरे जाने के बाद
कुछ दिए तो जलेंगे
मेरे जाने के बाद
यादें धुंदली होती भी हैं
तन्हाई काम चुभोती भी है
कुछ चर्चे काम चलेंगे
मेरे जाने के बाद
क्या कमाया, क्या गंवाया
किसका हक़, किसका सरमाया
किसके हाथों ये संभलेंगे
मेरे जाने के बाद 

उम्मीदें उजालों की मोहताज नहीं होतीं

सारे चिराग बुझाने के बाद
साफ़ नज़र आता है तेरा साया मुझे
उम्मीदें उजालों की मोहताज नहीं होतीं
यह राज़ अब समझ आया है मुझे
न तारों की चमक, न मशालों की आग
तेरी चाहत ने सफर कराया है मुझे
छोड़ जाता ये महफ़िल गर तू शरीक न होती
तेरी रौनक ने चुपचाप मनाया है मुझे

तेरी पहचान

घुटन खुले आसमान में क्यों है?
धूल की चिलमन रोशनदान में क्यों है?
सब कुछ है मेरी बाहों में लेकिन
मेरी यादों में वो तेरी पहचान क्यों है?

Friday, November 4, 2016

आज कल मेरे ख्वाब...

आज सूरज चाँद सा क्यूँ लग रहा है?
इंसान शायद रात को ज़यादा जग रहा है
धूप में गर्माहट नहीं, रोशिनी भी नम है
आज कल दिनों में शराफ़ते भी कम है
धुआं सा उठ रहा है, जाने क्या जल रहा है
हैवान राख चिताओं की माथे पे मल रहा है

खामखां दुनिया की फ़िक्रों को सोख्ते हैं
ख्वाब मेरे ऐसे ...नींदों को चोंकते हैं

फासले

इश्क़ फासलों का मोहताज न हो जाये
ये आशिक़ तन्हाई से नाराज़ न हो जाये
दूरियों का बहाना तो पुराना है मेरी जान
इस का अहसास मुझे आज न हो जाये
हम तो खतों में रूमानी हो चले हैं
न मिलना मगर तेरा अंदाज़ न हो जाये
तेरी शान में बुनते हैं काफियों के काफिले
तेरी बेरुखी से कड़वे मेरे अलफ़ाज़ न हो जाएं
बीमार हूँ तेरे हुस्न का, ए हूर की परी
नामौजूदगी तेरी मेरा इलाज न हो जाये
इश्क़ फासलों का मोहताज न हो जाये
ये आशिक़ तन्हाई से नाराज़ न हो जाये

तस्वीर




ये होठों की रंगत
कुछ ज़्यादा ही है
ये मस्ती की संगत
कुछ ज़्यादा ही है
मोना लीसा की भाँती
ये हलकी तबस्सुम
हलकी है भी मगर
कुछ ज़्यादा ही है
चेहरे को छू कर
वो ज़ुल्फ़ों का गिरना
चश्मे से चेहरे का
कुछ और निखरना
इस धड़कन से पूछो
कुछ ज़्यादा ही है

Sunday, October 30, 2016

इंद्रधनुष

इंद्रधनुष मटमैला मंज़ूर है
ये ज़िद्द है के मेरा गुरूर है
आसमां और भी थे  जिन्हें छू सकता था मैं
इस सतरंगी मायाजाल में कुछ तो ज़ुरूर है!

गुज़र गया दिन

गुज़र गया दिन या गुज़ारा मैंने
पूछ लिया सवाल ये दोबारा मैंने
ख़्वाबों के शहर में घूमा था मैं आज
देखा एक नया नज़ारा मैंने
गुज़र गया दिन या गुज़ारा मैंने
पन्ने पल्टाए थे अनपढ़ी किताबों के
लव्ज़ों के खेल को निहारा मैंने
दफ़्न यादों को कुरेद के निकाला है
कंकालों की शक्ल को सवारा मैंने
गुज़र गया दिन या गुज़ारा मैंने
ज़िन्दगी की दौड़ में थम जाना जुर्म है
रुकने का कर दिया इशारा मैंने
गुज़र गया दिन या गुज़ारा मैंने
फुरसत मिली थी बहुत अरसे के बाद
कर दिया वक़्त को आवारा मैंने
गुज़र गया दिन या गुज़ारा मैंने

मेरी परछाईं

तीस साल के फासले पे खड़ा नौजवान
मुझे आईना दिखाता है
और मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

मेरी कमज़ोरिओं से शायद अनजान है 
उसके लिए हर मुश्किल आसान है
मेरी उमंगों के फीके रंगों को
नई उमंगों से सजाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

जवानी का जोश है बरजोर उसमें
मेरे तजुर्बे का है निचोड़ उसमें
मेरी उम्र के मुसे मुसाए लिबासों पे
नयी चरक चढ़ाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

उन दोनों की महफ़िल में मैं पराया हूँ
दूर खड़ा सदियों पुरानी काया हूँ
मेरी उम्मीदों की परछाईं से दोस्ती कर
वो मुझे भूल जाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

बंद किताब

जिस पन्ने का मोड़ के कोना 
बंद कर दी थी ख़ास किताब
उस पन्ने के सब अलफ़ाज़ 
मांग रहे दिल से हिसाब 
छोड़ अधूरी वो कहानी 
जो जीने में  जुट गए 
अरमां कितने थे जो के बंद
उस किताब मे घुट गए 
अब फुर्सत में  वक्त की धूल
किताबों से झटकाई
फड़फड़ाते पन्नो से फिर 
उस कोने की चीख आयी 
थम गया जब पन्ना तो फिर
किरदारों से बात हुई  
वक्त पिघल गया और फिर
ना जाने कब रात हुई 
लगती थी जो सालों पहले
मन को इतनी रूमानी 
ज़िन्दगी के थपेड़ों संग  
लगती है अब अनजानी
कहानी के फीके रंगों 
में तो अब वो दम नहीं
किरदारों के हाव भाव में
तुम नहीं और हम नहीं 

होली का सबक

पक्के रंगों से खेलना छोड़ दिया मैंने
उड़ते गुलाल से रिश्ता जोड़ दिया मैंने
धुल जाने दो दिन की हरकतों को आज की आज
ज़हन से हर कल का हिसाब निचोड़ दिया मैंने

आतिशबाज़ी सिर्फ दिल की धड़कन में हो

आतिशबाज़ी सिर्फ दिल की धड़कन में हो
आसमां में तो मैंने सपने सजाये हैं
रोशिनी गम के तहखानों तक जाये 
झरोखों में ऐसे दीपक जलाये हैं
हर शख्स नए लिबाज़ पहन के इतराये
ज़हन से पुराने शिकवे झड़वाए हैं
शक्कर की तानाशाही मिठास पे क्यूँ हो
घोल मेरे जज़्बात ये शेर जो बनाये हैं
आतिशबाज़ी सिर्फ दिल की धड़कन में हो
आसमां में तो मैंने सपने सजाये हैं

एक हिदायत अपनी बेटी के नाम

कुरेदना है तुझे ऊंचाइयों को 
शिकस्त करना है खाइयों को 
शिखरों से याराना करना है तुझे 
बादलों संग दम भरना है तुझे 
हक़ से मांगेगी तू  आसमां का ताज 
पर हिदायत ये मेरी तुझको है आज 
खुद की हकीकत से जुड़ना तो सीख
उड़ने से पहले तू उड़ना तो सीख  

तू सूरत न देखे मंदियों की
खुश-हाल हो राहें बुलंदियों की
तेरे अंदाज़ में कुछ कमी न हो
कमी हो तो आँखों में नमी न हो
हकीकत की हदों से लड़ लेगी तू
हर कमी के आगे बढ़ लेगी तू
तंगियों में पर सिकुड़ना तो सीख
उड़ने से पहले तू उड़ना तो सीख

इरादों को अपने इशारा तो दे 
जज़्बे को अपने एक नारा तो दे 
हौसले को अपने दे एक चेहरा 
मंज़िल पे परचम तू अपना लहरा
बदलेंगी राहें जब बदलें हालात 
बदलना है तुझे भी इन सब के साथ
हालातों के साथ तू मुड़ना तो सीख
उड़ने से पहले तू उड़ना तो सीख  

बचपन का मोहल्ला

बचपन का मोहल्ला था मासूमियत की गली थी ज़िन्दगी को परखने की दो दिलों में खलबली थी लड़कपन के मैदानों में जवानी से मुलाक़ात हुई यारी के चौराहे पे मुहब्बतों की बात हुई गेंद बल्ला चोर सिपाही यह खेल भी खेले थे हमारे लिए तो दुनियादारी मस्त दिवाली मेले थे ज़िन्दगी की दौड़ भी दौड़ी साथ साथ ही दौड़े थे यार के सर पे बोझ पड़ा तो कंधे अपने चौड़े थे कच्ची पक्की नसीहतों को आपस में बांटा करते थे भले बुरे का फर्क भी खुद ही आपस में छाँटा करते थे उम्मीदों के महल बनाते छुट्टी की दोपहरों में छोटी छोटी फ़तेह को तकते एक दूजे के चेहरों में वक़्त आया जब इस दिल को देने का नाज़ुक हाथों में कैसे दायरा बढ़ा दिया यारी का चंद मुलाकातों में दो यारों से चार हुए तो यारी के रंग कुछ और चढ़े हैं यारी लव्ज़ कुछ छोटा है ये तालुक्कात कुछ और बढ़े हैं अंकल चाचा के ओहदों से खुद अपनी हस्ती बढ़ा ली है हर मौके पे ना ना करते भी थोड़ी बहुत चढ़ा ली है दिल से पूछो क्या मिलता है हम को इन मुलाकातों में? ऐसा क्या है इस रिश्ते में क्या लुत्फ़ पुरानी बातों में? लड़कपन का आईना तू है बचपन का है खज़ाना तू ठहाकों वाली हंसी तेरे संग बेफिक्र ख़ुशी का ठिकाना तू! सालगिरह पे सलाह है तुझको जन्नत की हसरत करना मत यहीं है जन्नत, यहीं है कुर्बत तब्दील-ए-फितरत करना मत

रंगरेज़

वक़्त के निशां तेह बनकर
दीवारों पे बस्ते गए
हम मसरूफ ज़िन्दगी में
कुछ रोते कुछ हस्ते गए
वो बढ़ते कद का हिसाब
स्याही की सीढ़ी रखने लगी
ज़ायकेदार छौंकों का मज़ा
दीवारें भी चखने लगीं
टंगी हुई तस्वीरों के पीछे
मानो लगी परछाईं थीं
तसवीरें तो बदल गयीं
वो यादें वहीँ समाईं थीं
बचपन के नन्हे हाथों की
छाप नज़र आ जाए कहीं
अल्हड़पन की शख्सियत ने
परचम हैं चिपकाये कहीं
त्योहारों की बात करें तो
पूजा में छींटे रोली के
और छेड़ छाड़ में बिखर गए
वो रंग हमारे होली के
वक़्त के निशां तेह बनकर
दीवारों पे बस्ते गए
हर निशाँ मिटाकर रंगरेज़
अपने अपने रस्ते गए

महफ़िल-ए-एनिवर्सरी

ज़िन्दगी में पिरो लिए फलक के कुछ सितारे एक चाँद भी चमकता रहा बगल में हमारे
हसरतों की पतंगें हवाओं में नचाईं है अपने इस घरौंदे में वही पतंग सजाईं है
घुप ग़मगीन अंधेरों में भी उम्मीदों को ही टटोला है एक दूजे का हाथ पकड़ हर नया झरोखा खोला है
दो फुलझड़ियाँ हैं अपनी भी हर रात दिवाली करती हैं इस गठबंधन की गुल्लक में ये मुस्कानें तो भरती हैं
दुनियादारी की सख्त धूप में जब जब झुलसे अपने पाँव कई दरख़्त हैं इस महफ़िल में जिनने दी है हमको छाँव
नोंक झोंक में गुज़र गए कितनी जल्दी पच्चीस साल ये वैसी की वैसी देखो पर सफ़ेद हो गए मेरे बाल
हलके फुल्के और गहरे भी ऐसे हैं अपने जस्बात बैंड बाजा बजा के निकली ये पच्चीस बरसों की बारात!

बिखरी यादें

बिखरे पड़े थे
यह दमकते ख़याल
तेरी याद में जिन्हें
चमकाया था मैंने
चुभते थे पैरों में
आँखों में लगते थे
कुछ टुकड़ों को
साँसों में पाया था मैंने
झिलमिल सुलगते थे
आईने से लगते थे
उनमें देखा तो खुद को
ही पाया था मैंने
समेटा जो उनको
के सफा कर दूँ मन से
बहुत इस पर दिल को
रुलाया था मैंने
बिखरे पड़े हैं
यह दमकते ख़याल
तेरी याद में जिन्हें
चमकाया था मैंने
चुभते हैं चुभने दो
लगते हैं लगने दो
इन्ही यादों में जीवन
गवाया है मैंने

ख़ुशी बेवजह शोर मचाती है



तोरण सजी दरवाजों पर चरक चढ़ी लिबाजों पर लड़ियों के घूंघट हर घर ने ओढ़े मिठाई ने रिश्ते पडोसी से जोड़े ताश के पत्ते जिताते हराते रिवाजों में कैसी हरकत ये पाते के ख़ुशी बेवजह शोर मचाती है गम के अँधेरे का गला घोट जाती है तुम्हे भी ख़ुशी का पूरा सा हक़ हो जादू दिवाली का मुबारक हो मुबारक हो मुबारक हो