भोली है
निकली है घर से
होली है
दुबकी नहीं डर से
दरिंदा है
छेड़ेगा खामखां में
परिंदा है
वो दिल आसमाँ में
डरेगी नहीं
वो गलत ताकतों से
मरेगी नहीं
उसकी चाह आफतों से
ख़ौफ़ज़दा हूँ
खतरों का ज़िक्र तो करूंगा
एक पिता हूँ
हर लम्हा फ़िक्र तो करूंगा
टोकूंगा नहीं
सबक़ है इस किस्से में
रोकूंगा नहीं
रंग सभी हैँ तेरे हिस्से में