Sunday, December 13, 2020

नींद की कचेहरी


 नींद की कचेहरी में

मुकद्दमा किया अपनों ने  

कटघरे में दिल था मेरा 

और बयान दिया सपनों ने  


कई पैने सवाल किये 

ख़्वाबों को टटोला गया

ज़हन में छुपे हर राज़ को

बेरहमी से खोला गया


ख़्वाबों की तो ये फितरत थी 

मनचाहा सच भुना गए 

पर खुदा को नाज़िर मानकर

ये दिल का हाल सुना गए 


वकील भी इतने शातिर थे

बस यूं करीं तहक़ीक़ातें 

जो महज़ हसीं ख्याल ही थे

बन गयीं असल वारदातें


मुंसिफ था रिश्तों का कायल 

दिल को मुल्ज़िम करार किया 

दिल क़ैद किया बस रिश्तों में 

सब ख़्वाबों को तड़ी-पार किया 


मसरूफ बेमानी कामों में 

मैं जस्बातों से डरता हूँ 

ख्वाब न आएं आँखों में तो 

नींद से परहेज़ भी करता हूँ