साँसों की हरकत
पे शक है मुझे
यारों की कुर्बत
पे शक है मुझे
है कैसी मजबूरी
ये दो गज़ की दूरी
अब उसकी रेहमत
पे शक है मुझे
दिखता ही नहीं
दायरा-ए-फलक
छुपा है कहीं
वो रंगीं धुनक
कुदरत-ए-उसूल हो
हस्ब-ए-मामूल हो
इस उम्मीद की जुरर्हत
पे शक है मुझे
साँसों की हरकत
पे शक है मुझे
कहर के चलते
सब उधड़ रहा
अनदेखे हरीफ़ से
इंसां लड़ रहा
ये कौन सा ज़हर है
जला रहा शहर है
कायनात की वहशत
पे शक है मुझे
साँसों की हरकत
पे शक है मुझे
बर्दाश्त नहीं है
बेबस मजबूरी
मज़लूम न देगा
इस को मंज़ूरी
अब इस लाचारी
से जंग है हमारी
और...
लाचारी की ताकत
पे शक है मुझे
साँसों की हरकत
पे शक है मुझे