नफरत की देहलीज़ पे
कितने तबाह हुए
सदियों की तारीख में
क्या क्या गुनाह हुए
नफरत को क्या कोसें
कुछ मज़हबी इश्क़ के
खुशवहमी ख्याल में
पूरे फनाह हुए
भरे बाज़ार ज़ुल्म को
रोकें तो किस तरह
मूक, बधिक और अंधे
सारे गवाह हुए
टीस उठे जब दर्द की
बेबस रुलाई में
गैरों का शोक मानकर
सब बेपरवाह हुए
किसने किसकी जान ली
हुआ पहला वार क्यों
अफवाहों की भीड़ में
हम खुद अफवाह हुए
जो लड़ रहा है सोच
तुझे हांकता है कौन
कौन चाहता है जंग ये
बिना सुलह हुए
बैठे दूर दराज़ जो
चिंगारी को दें फूंक
दरबार-ऐ-हार-जीत में
वो जहाँपनाह हुए
तलाशा है
ज़माने ने
मुझे मेरी
लिखावट में
उलझे फिर
रहे हज़रात
ये लव्ज़ों की
सजावट में
नहीं समझे
के मकसद और
है सुनने
सुनाने का
वो तहखाना
तुम्हारा है
ये शेरों की
इमारत में
भरी महफ़िल
में सुनते हो
वो किस्से जिस
खुदाई के
सजदा उस को
तुम करते हो
छुप छुप कर
इबादत में
मेरे शेरों
की वाह वाही
जो करते हो
तहे दिल से
है अरमानों
की जिरह वो
तुम्हारी ही
वकालत में
कभी मरहूम
मुहब्बत हो
हो एक तरफ़ा
कभी वो इश्क़
है मरहम का
सौदा नज़्म
जो पढ़ता मैं
तिजारत में
कभी हो ज़ुल्म
अज़ीज़ों पर
हुकूमत की
बदौलत तो
जज़्बे को मैं
करता सख्त
सुनाकर शेर
बग़ावत में
तुझे ओ हुस्न
जो करती है
मुझपर ज़ुल्म
ही दिन-बर-दिन
लिखे लहू
से दिल पर शेर
नज़र तुझपर
सदाकत में