Saturday, May 29, 2021

दीवारों का हक़

 दीवारों का हक़ अदा कर दो

खोलो खिड़की, दरवाज़ा बड़ा कर दो

प्यार होगा दायरों से

तो रुक जायेंगे लोग

ख़ाक होगा गर पहरा कड़ा कर दो?

Saturday, May 1, 2021

वापस दे दो दुनियादारी


अंजानो से हाथ मिलाना

यारों को भी गले लगाना

बागीचों में साथ घूमना

हसीनों के वो हाथ चूमना

महफिलों में शेर सुनाना

दावतों में दावत खाना 

बस बस कर के जी भर पीना

जिम में जाकर छोड़ पसीना

भरी सड़क पर देना गाली

सिनेमा में सीटी और ताली

चाट पापड़ी सड़क किनारे

नाईट क्लब्स के वो लश्कारे

नई जगह पर सैर सपाटे 

ढाबों में वो गर्म पराठे 

कभी होड़ थी ओहदों की

कभी मुनाफों सौदों की

सृष्टि से भी जीत रहे थे 

कैसे दिन वो बीत रहे थे 

छूट गए सब महामारी में 

कुछ रहा नहीं दुनियादारी में

 

अब तो घर में चिंतन करते

चेतनाओं का मंथन करते

संसारिकता से मुँह मोड़ते 

नाता मोह माया से तोड़ते

हर दिन आंकड़ों को गिनता

दूर से ही अपनों की चिंता

साँसों में अब दर्द का घर है

धन दौलत और तन नश्वर है 

सृष्टि अंतर्मन में सारी

छूट गयी अब दुनियादारी

 

इतना सब होने के बाद 

करते ऊपर वाले को याद

पूछा उससे क्यों मरते हैं

भलमानस जो श्रम करते हैं

अच्छे भले लाचार हुए हैं

आखिर क्यों बीमार हुए हैं

इंसानियत क्यों हार रही है

ये महामारी क्यों मार रही है

माना ये दुनियादारी थी

जो हम पर इतनी भारी थी 

हम मुन्ने मुनिया में भी खुश थे

छोटी दुनिया में भी खुश थे 

फिर हम क्यों बीमार हुए

ऐसे क्यों लाचार हुए?   

भगवन कब तक ये लाचारी

वापस दे दो दुनियादारी

वापस दे दो दुनियादारी