दीवारों का हक़ अदा कर दो
खोलो खिड़की, दरवाज़ा बड़ा कर दो
प्यार होगा दायरों से
तो रुक जायेंगे लोग
ख़ाक होगा गर पहरा कड़ा कर दो?
दीवारों का हक़ अदा कर दो
खोलो खिड़की, दरवाज़ा बड़ा कर दो
प्यार होगा दायरों से
तो रुक जायेंगे लोग
ख़ाक होगा गर पहरा कड़ा कर दो?
अंजानो से हाथ मिलाना
यारों को भी गले लगाना
बागीचों में साथ घूमना
हसीनों के वो हाथ चूमना
महफिलों में शेर सुनाना
दावतों में दावत खाना
बस बस कर के जी भर पीना
जिम में जाकर छोड़ पसीना
भरी सड़क पर देना गाली
सिनेमा में सीटी और ताली
चाट पापड़ी सड़क किनारे
नाईट क्लब्स के वो लश्कारे
नई जगह पर सैर सपाटे
ढाबों में वो गर्म पराठे
कभी होड़ थी ओहदों की
कभी मुनाफों सौदों की
सृष्टि से भी जीत रहे थे
कैसे दिन वो बीत रहे थे
छूट गए सब महामारी में
कुछ रहा नहीं दुनियादारी में
अब तो घर में चिंतन करते
चेतनाओं का मंथन करते
संसारिकता से मुँह मोड़ते
नाता मोह माया से तोड़ते
हर दिन आंकड़ों को गिनता
दूर से ही अपनों की चिंता
साँसों में अब दर्द का घर है
धन दौलत और तन नश्वर है
सृष्टि अंतर्मन में सारी
छूट गयी अब दुनियादारी
इतना सब होने के बाद
करते ऊपर वाले को याद
पूछा उससे क्यों मरते हैं
भलमानस जो श्रम करते हैं
अच्छे भले लाचार हुए हैं
आखिर क्यों बीमार हुए हैं
इंसानियत क्यों हार रही है
ये महामारी क्यों मार रही है
माना ये दुनियादारी थी
जो हम पर इतनी भारी थी
हम मुन्ने मुनिया में भी खुश थे
छोटी दुनिया में भी खुश थे
फिर हम क्यों बीमार हुए
ऐसे क्यों लाचार हुए?
भगवन कब तक ये लाचारी
वापस दे दो दुनियादारी
वापस दे दो दुनियादारी