उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते
दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते
हर लौ महज़ रोशन उजाले नहीं करती
परवानों के मातम हैं, सुनाई नहीं देते
अर्सों से हमें मर्ज़-ए-मोहब्बत की सज़ा है
चारागर तुम ही हो, दवाई नहीं देते
सब कुछ जो लुटा देते थे शायर की कलम पर
इस दौर में दो बूँद तक स्याही नहीं देते
ज़माना मेरे शेरों को सुनने चला आये
एक तुम ही हो जो वाह वाही नहीं देते
उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते
दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते