Tuesday, April 28, 2026

किस्मत के मारे kismat ke maare

आँखों के तेरी 

इशारे हैं क्या?

मुस्कानों के ये 

लशकारें हैं क्या?

दूर से घायल  

कर देगी हमको 

किस्मत के हम इतने 

मारे हैं क्या?!

गैरों संग लुत्फ़-

अन्दोज़ी इतनी!

हम बस सुख दुःख के

सहारे हैं क्या!

हुआ बहुत अब 

बसा ले तू दिल में 

कब तक भटकेंगे

बंजारे हैं क्या?

तोड़ी ज़ंजीरें  

ज़माने की सब

ये बीच हमारे 

दीवारें हैं क्या!

मैं इर्द-गिर्द तेरे

बुनूँ जितने खाब

आसमान में उतने

सितारे हैं क्या?  

आग के दरिया से

डूब के गुज़रे तो 

जलती दुनिया के  

अंगारे हैं क्या! 

दर पे है तेरे

आशिक़ों की भीड़ 

मेरे मुखातिब  

बेचारे हैं क्या!? 

बहुत रंगीले

हैं मेरे सपने

मेरे ये सपने

हमारे हैं क्या? 


Wednesday, March 11, 2026

मलबे और राख के सौदागर malbe aur raakh ke saudagar

सियासती ये घाव हैं जो

दरियाओं से गहरे हैं

कहने को तो कुछ भी नहीं

बस सजे हुए कुछ सेहरे हैं

न जाने कितनी नस्लें 

फुँक जाएँगी जंगों में

न जाने कितने रिश्ते

लुट जायेंगे दंगों में

तेल से सस्ता खून है और

सने हुए सब चेहरे हैं

सियासती ये घाव हैं जो

दरियाओं से गहरे हैं


हैवानों की फितरत है

हमलावरों के दिल में

आग-ओ-बारूद लिक्खा है

इन सब के मुस्तकबिल में

जिस सदी में ये शुरू हुआ

ये उस ही सदी में ठहरे हैं 

सियासती ये घाव हैं जो

दरियाओं से गहरे हैं

 

इंसां से इंसां प्यार करे

हर मज़हब यही सिखाता है

पर ये कैसा इंसां है

जो और ही रंग दिखलाता है

नफरत के बाज़ार लगाके 

मुहब्बत्तें पे पहरे हैं

सियासती ये घाव हैं जो

दरियाओं से गहरे हैं


गुरूर है जिसको ताकत पर

मत भूल के वक़्त बदलता है

जो आज हँसे इन कब्रों पर

उसका भी सूरज ढलता है

सुनेंगे खुद की चीखें वो 

जो आज के शोर में बेहरे हैं

सियासती ये घाव हैं जो

दरियाओं से गहरे हैं


मलबे और राख के सौदागर

धुंआ धुंआ हो जायेंगे

सोने और तेल के लालच में

वो रेत के टीले पाएंगे

खून से लथपथ होंगे वो

सपने जो आज सुनहरे हैं

सियासती ये घाव हैं जो

दरियाओं से गहरे हैं


Tuesday, December 9, 2025

डायरी diary

 तुम्हारी पुस्तक का एक पन्ना

सजा दिया है ये शायरी से

हर सिफहा बाकी निसार तुमपे 

नवाज़ो अपनी कारीगरी से

वो तनहा लम्हे जो तुम गुज़ारो

इस छोटे तोहफे के संग अपने

वो लम्हों संग मेरी चाहतों की

महक उठेगी इस डायरी से!  


इश्कबाज़ी ishshakkbaazi

 ये ज़माना क्या जाने की 

आतिशबाज़ी क्या होती है

पंद्रह साल पुरानी होकर 

उल्फत ताज़ी क्या होती है

अल्हड़पन की ख्वाहिश को

पकी उम्र में पाया जो

तब जाना के दिल हरवाके

जीती बाज़ी क्या होती है 

इतने बरसों की दूरी से

हालातों की मजबूरी से

लगा निशाना तो जाना के

तीरंदाज़ी क्या होती है

जश्न-ऐ-मुशाबरत मनाके

जिस्मों की वो प्यास मिटाके

पहली बार एहसास किया के

खुश-मिजाज़ी क्या होती है

अर्सों पहले शेर सुनाके 

जवां हुस्न का दिल फुसलाके 

हमराज़ों को जता दिया के 

दूर-अंदाज़ी क्या होती है

आशिक़ हूँ मैं ये माना है 

इश्क़ तेरा एक पैमाना है

इसको पा के पता लगा 

के इश्कबाज़ी क्या होती है!

Monday, December 8, 2025

हकीकत नहीं haqeeqat nahin

बस मिलती है ज़िल्लत, अक़ीदत नहीं

भयानक बला है, गनीमत नहीं 

पर आशिक़ से पूछो तो बोलेगा वो 

मुहब्बत है जन्नत, मुसीबत नहीं


तू आशिक़ नहीं तो तू समझेगा क्या 

इस मजमे में तेरी शरीकत नहीं 


बेमानी है जीना मुहब्बत बिना 

ऐ दोस्त, ये मेरी नसीहत नहीं 


हुस्न वालों को उसने बनाया है खूब

सूरत तो दी है पर सीरत नहीं 


है हुनर, मैं परखता हूँ हीरों को 

दुनिया में आशिक़ की कीमत नहीं 


मशहूर कसीदे मोहब्बत के हैं 

हैं किस्से कहानी -- हकीकत नहीं 

Friday, November 14, 2025

हो नहीं सकता ho nahin sakta

जो शिद्दत से किया था इश्क़ 

दोबारा हो नहीं सकता

के इसके एवज़ दौलत का

तिजारा हो नहीं सकता 


खंजर पीठ पर जिनने 

भोंका है वो हाथों में

मेरा तो दिल ये कहता है

तुम्हारा हो नहीं सकता 


तेरी चाहत को परखे बिन

गुज़ारा जिस ने भी जीवन

उससे ज़्यादा तो किस्मत

का मारा हो नहीं सकता


तू जो आये महफ़िल में 

तुझे कोई और न देखे

जो देखे तो मुझे वो शक़्स 

गवारा हो नहीं सकता 


मीठा लहजा है उसका

जुबां भी उसकी मीठी है

ऐ दरियादिल तेरा पानी

तो खारा हो नहीं सकता


तू मेरे रु-बा-रु भी हो

तेरी आँखों में झाँकू मैं

ख़ुशनुम्मा इससे ज़्यादा

नज़ारा हो नहीं सकता

Tuesday, October 21, 2025

सिलसिला silsila

 हम क्यों ज़िन्दगी से गिला करते हैं

खामखां उस शक़्स से मिला करते हैं

भूल जाओ वो हारी हुई बाज़ी को  

शुरू एक नया सिलसिला करते हैं