गुज़र रही है रात भी
चल रही है बात भी
खुद से ही झगड़ रहे
गरेबान पकड़ रहे
अपनों से परे परे
सपनों के क़त्ल करे
सुबह की थकान का हैं इंतज़ार हम
ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम
पाई पाई जोड़कर
अपनी कमर तोड़कर
रिश्तों को बना बना
हाथों को सना सना
अपनी भूख मारकर
हर पड़ाव पार कर
अपने शहर-ऐ-सुकून से हैं फरार हम
ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम
प्यार तो बहुत मिला
इसका करें क्या गिला
पर एक हसीन दौर था
उसका मज़ा और था
अब भी वो सुरूर है
ये दिल नशे में चूर है
यूं अपने ही ढकोसले के बन गए शिकार हम
ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम
नाकामियों का शोर है
दिल में छिपा चोर है
जो भी मुम्किनात था
क्या उसका दिया साथ था
भटक गए इरादों से
खुद से किये वादों से
खुद अपने घर के ही बने हैं ख़लफ़शार हम
ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम