Sunday, December 13, 2020

नींद की कचेहरी


 नींद की कचेहरी में

मुकद्दमा किया अपनों ने  

कटघरे में दिल था मेरा 

और बयान दिया सपनों ने  


कई पैने सवाल किये 

ख़्वाबों को टटोला गया

ज़हन में छुपे हर राज़ को

बेरहमी से खोला गया


ख़्वाबों की तो ये फितरत थी 

मनचाहा सच भुना गए 

पर खुदा को नाज़िर मानकर

ये दिल का हाल सुना गए 


वकील भी इतने शातिर थे

बस यूं करीं तहक़ीक़ातें 

जो महज़ हसीं ख्याल ही थे

बन गयीं असल वारदातें


मुंसिफ था रिश्तों का कायल 

दिल को मुल्ज़िम करार किया 

दिल क़ैद किया बस रिश्तों में 

सब ख़्वाबों को तड़ी-पार किया 


मसरूफ बेमानी कामों में 

मैं जस्बातों से डरता हूँ 

ख्वाब न आएं आँखों में तो 

नींद से परहेज़ भी करता हूँ


Monday, November 16, 2020

वाह वाही


 उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते 

दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते


हर लौ महज़ रोशन उजाले  नहीं करती

परवानों के मातम हैं, सुनाई नहीं देते 


अर्सों से हमें मर्ज़-ए-मोहब्बत की सज़ा है  

चारागर तुम ही हो, दवाई नहीं देते 


सब कुछ जो लुटा देते थे शायर की कलम पर

इस दौर में दो बूँद तक स्याही नहीं देते


ज़माना मेरे शेरों को सुनने चला आये

एक तुम ही हो जो वाह वाही नहीं देते


उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते 

दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते


Sunday, October 18, 2020

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

हर मंज़िल की थोड़ी मंदी सी चमक है

टेढ़े मेढ़े रस्तों से जो गुज़रे हैं हम

जवानी में लगता था सीधी सड़क है


हर मोड़ पे कई चेहरे अनजान मिले 

कुछ मेहरबान मिले, कुछ बेईमान मिले

जब हमसफ़र बने तो पता न चला

ये संगत का असर है बुरा या भला

तजुर्बों से सीखा नया एक सबक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  


खूब रफ़्तार से मुहब्बत करके भी देखी

मस्त हवाओं में उड़ान भरके भी देखी

पथरीले वो मंज़र, हवाओं के झोंके

वो गिरना संभालना और नज़रों के धोखे 

सख्त दिल ये ज़मीन और बेरहम फलक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  

  

मुड़कर जो देखें तो बुरा हाल तो होगा

मौके जो चूके, उनपर मलाल तो होगा 

वक़्त जाया कर जब भी सराहे नज़ारे 

किसी हमसफ़र संग गिने थे सितारे

वही पल में हसीं यादों की झलक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  

  

लम्हे थे जो जमकर जी लिए मैंने 

अब परदे आईनों पे सी दिए मैंने

नज़र सामने है, और सीधी ही है सड़क

मोड़ आएं तो आएं, चलूँगा बेधड़क

वो जीना क्या जो हर कदम पे हिचक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है


 ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

हर मंज़िल की थोड़ी मंदी सी चमक है

टेढ़े मेढ़े रस्तों से जो गुज़रे हैं हम

जवानी में लगता था सीधी सड़क है


Friday, October 2, 2020

हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा


हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


इश्क़ का इत्तर लव्ज़ों में तोलकर  

काफियों में खयालात बोलकर

हालात-ए-जिगर तो सुनाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


मुखड़े की रौनक मुखड़े में  डाल

अंतरे में लिखूं मैं दिल का हाल

नज़ाकत से उनको लुभाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


मुद्दे तो हैं चुनने को मगर 

श्रोता तो हों सुनने को इधर! 

रोज़गार मुझे भी कमाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा 

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


Saturday, September 19, 2020

आईने से मुहब्बत

 

आईने से मुहब्बत इतनी न करो

ज़ालिमाना ये हरकत इतनी न करो

आईनों की तारीफें अच्छी हैं मगर

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


हाँ वाजिब है तेरी ज़ुल्फ़ों का इतराना

बिना लव्ज़ों के पूरी ग़ज़ल कह जाना

शेर कुछ हम कहें इसका मौका भी तो दो 

खुद अपने से ही उल्फत इतनी न करो  

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


सेल्फी में वो तबस्सुम केहर ढाती है

कभी कभी वो तस्वीर नज़र आती है 

हम आशिक़ तस्वीर से कर लेंगे गुज़ारा

तुम तस्वीरों में किल्लत इतनी न करो

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


ज़ुल्मों को तेरे देख रही है खुदाई 

मिसाल बन रही है तेरी बेपरवाही 

नज़र में खुदा की ये हिमाकत होगी

इसलिए ये हिमाकत इतनी न करो 

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


Friday, September 11, 2020

अनजानों का मजमा

अनजानों का मजमा
फासलों को भरता है
वाकिफ तो दूरियों का
अहसास दिलाते हैं

दूर जो मशाल 
जल रही है तेरी
देख उसे अंधेरों में
हम सुकून पाते हैं

वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव 
हमें कुचले जाते हैं

तुम खड़े रहना 
अपनी बाहें फैलाए
हम न सही हमारे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं

हमारी मुलाकातें

हमारी मुलाकातें होतीं हैं
शायद तुझे अहसास नहीं

ख़यालों में तुझे बुलाता हूँ
तेरी ज़ुल्फ़ों को सहलाता हूँ
दिन कैसे गुज़रा 
ये बताता हूँ
रोज़मर्रा की बातें हैं
ऐसी तो कोई ख़ास नहीं
हमारी मुलाकातें होतीं हैं
शायद तुझे अहसास नहीं

तेरे सपनों को सुनता हूँ
अपने भी थोड़े बुनता हूँ
यादों में जो चमक रहे
मैं उन लम्हों को चुनता हूँ
दूर से उनको देख के खुश हूँ
क्यूंकि अब वो मेरे पास नहीं
हमारी मुलाकातें होती हैं
शायद तुम्हें एहसास नहीं

कुछ खालीपन तो लगता है
एक मीठा दर्द सुलगता है
आशिकानापन 
तनहा शामों का ठगता है
कहने को तो सब ठीक है
कोई गम नहीं, मैं उदास नहीं
हमारी मुलाकातें होती है
शायद तुझे अहसास नहीं

इबादत की इजाज़त

इबादत की इजाज़त तू मुझे दे दे

तेरे जलवों की हसरत तू मुझे दे दे 

फिरता हूँ बेमकसद गलियों में तेरी

आशिक़ाना ये मकसद तू मुझे दे दे 


तू नज़दीक है, इस बात का मैं खैर करूँ 

और आशिक़ भी हैं, उन सब से मैं बैर करूँ  

लम्हा ही सही, दूर से कर लूँगा दीदार 

लम्हे में भरी मुद्दत तू मुझे दे दे 


पिरोए हैं ज़ुल्फ़ों में तेरे ख्वाब कई 

डुबो दिए तेरे नूर में आफताब कई  

वफ़ाएं और भी हैं निभाने के लिए

बेवफाई की तोहमत तू मुझे दे दे 


कहे तू के मैं खुद की हदों में रहूँ

बेसुद्ध या बेहाल मयकदों में रहूँ 

हो नशा तेरा, किसी शराब का न हो 

इसी सुरूर की ग़फ़लत तू मुझे दे दे 


यूँ तो चाहत की कीमत बहुत सस्ती है

तेरी आँखों की चमक ही में ये बस्ती है

तू इधर देख, चकाचौंध नज़ारा होगा

उस नज़र से मुहब्बत तू मुझे दे दे     


इबादत की इजाज़त तू मुझे दे दे

तेरे जलवों की हसरत तू मुझे दे दे 

फिरता हूँ बेमकसद गलियों में तेरी

आशिक़ाना ये मकसद तू मुझे दे दे 


Saturday, September 5, 2020

लहरों का बैर

  

लहरों का बैर कश्ती से नहीं

उलझती वो अपने ही पानी से हैं


माझी उन लहरों से जूझेगा ज़रूर 

पर रिश्ता तो उसका रवानी से है


हवाएं भी रुख बदलती रहेंगी

सरोकार अपनी तर्जुमानी से है 


साहिल कई हैं, ठिकाना कहाँ है?

फैसला ये मेरी मनमानी से है


मौसम बदलेंगे और बारिश भी होगी

ये तमाम रंग मेरी कहानी से हैं 


जल परियां भी होंगी सफर में कई 

मेरा इश्क़ तो बस एक दीवानी से है


लहरों का बैर कश्ती से नहीं

उलझती वो अपने ही पानी से हैं 


Tuesday, August 18, 2020

नई शुरुआतें

देर सवेर मुलाक़ात तो होगी

तकल्लुफ सही, पर बात तो होगी

मोहल्ला वही, ये रिश्ते वही

फिर से सही, शुरुआत तो होगी


Saturday, August 15, 2020

तजुर्बों के तोहफे

 तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल 

जद्दोजहद की शिकन

तो कभी सफ़ेद बाल


रिश्तों की फुलझड़ियाँ 

हसीं लम्हों की कड़ियाँ 

फ़तेह मुसीबतों की 

शिकस्त मुहब्बत्तों की  

जश्न कामियाबी का

नाकामी पे मलाल

तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल 


 

यारों संग अय्याशियां 

ज़माने की बदमाशियां 

अहसासों में मनमुटाव

जिस्म की चोटें, दिल पे घाव

ग़मों की खामोश चुभन 

उल्फतों का उबाल

तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल


हैसियतों की लिए जंग 

आवारगी का अपना रंग

गलत सही के चौराहे

अहम् फैसले मनचाहे 

ज़िन्दगी की शतरंज में

जोखिम भरी वो चाल

तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल


Wednesday, July 22, 2020

इंतेखाब

बहुत कुछ कह जाती है ज़िन्दगी हमसे 
सुनो तो शायरी है, न सुनो तो शोर 

पेचीदा हैं ये रिश्तों के रस्म-ओ-रिवाज़ 
निभाओ तो ज़ंजीर है, निबटाओ तो डोर 

इंतज़ार की रातों का अंत होगा ज़रूर 
शुबहा से टूटें ख्वाब, उम्मीद रहे तो भोर 

इज़हार-ए-मुहब्बत करें भी तो कैसे 
कह दें तो जोरा जोरी, न कहें ...कमज़ोर 

बहुत कुछ कह जाती है ज़िन्दगी हमसे 
सुनो तो शायरी है, न सुनो तो शोर 
    

Tuesday, June 9, 2020

ग़ज़ब


रातों के अंधेरों का 
कुछ तो सबब ज़रूर होगा

ग़मगीन इस माहौल में
कहीं रब ज़रूर होगा

तू नहीं तुझ पर शायरी 
में मसरूफ हो रहे हैं

इस तंहाई के सेहर में
कुछ ग़ज़ब ज़रूर होगा

Saturday, May 30, 2020

चिलमनों से बदलते रिश्ते

हुआ करता था मेरा चिलमनों से बैर 
तेरे जलवों पे उनका पहरा जो था 

अब दौर-ए-कोरोना है
एहतियातों की बारिश है
दूर से ही मिलना है
ये चिलमनों की साज़िश है

कर ली दोस्ती उन पर्दों से 
उन पर्दों पे तेरा चेहरा जो था

Tuesday, April 28, 2020

करोना-क़ैद

ये दौर-ए-हालात हैं अजीब-ओ-गरीब से 
के अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से

जस्बातों की चादर में सलवट भी देखी
रिश्तों की नींद में करवट भी देखी

उम्मीदों के आँगन में दीवार भी थी
और प्यार के दरिया में दरार भी थी

दुखती हुई नव्ज़ को खामोश भी देखा
अनकहे अलफ़ाज़ का रोष भी देखा

देखा कई अरमां नज़रअंदाज़ थे
और कई आम मुद्दे छुपे राज़ थे

ये मन मुटाव के बादल सालों घिरते रहे 
हम मसरूफियत की चादर ओढ़े फिरते रहे 

जब हुए करोना-क़ैद घर में नसीब से
अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से 

Tuesday, April 14, 2020

शीशों की दीवार

रोशिनी मेरे कमरे 
में कम तो नहीं है
तेरी परछाइयों का ज़ालिम
पर ये सितम तो नहीं है 
मन टटोलता है
दूरियों के अँधेरे
कुछ लम्हों की मशाल
भी हाथ में है मेरे
गुफ्तगू की चिंगारियां 
ख़यालों में झूमती हैं
दीवानगी की जुगनी  
बंद घर में घूमती है 
ये घर भी कुछ अजीब है
के शीशों की दीवार है
घर में बहुत अज़ीज़ हैं
तू है, मगर उस पार है।

Wednesday, April 1, 2020

ज़हर


कैसा ये दौर है कैसा ये शहर है?
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़मीन तो खुश है आसमान चहकता है
जंगल जवां है बाग़ फिर महकता है
दरियाओं  में भी उमंग की लहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

छाती फैलाकर  दरख़्त तो बुलंद हैं
इंसानी इरादों का कारखाना बंद है
वक़्त की चाल में कैसा ये पहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

तितली नाचती है भवरा गुनगुनाता है
यार दूर रहते हैं मोर छत पे आता है
जुगनू की रात है परिंदों की सहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ख्वाहिश पे ताला  मंसूबों की हड़ताल  
ताकतों की शिकस्त कीटाणु का कमाल 
सवाल पूछते हैं मंथन है या कहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़हर हज़म कर या उगल दे बहार
कुदरत को दोष दे या खुद कर इकरार   
तेरी करतूतों की तुझ पर ही मेहर है
कैसा ये दौर हैcकैसा ये शहर है 
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

Sunday, March 1, 2020

कुछ नए मकाम



चलो जवानी से पीछा छूटा
अब काम के काम हो जाएं 
नोन तेल लकड़ी के आगे 
कुछ नए मकाम हो जाएं

फिकरों के हिसाब लगाकर
जोड़, घटा और भाग गुना कर 
वसीहतों पे नाम चढ़ाकर 
हम खुद अपने नाम हो जाएं 
अब काम के काम हो जाएं

जलवों के अरमानों से हटकर
हुस्न के रेशम जाल झटक कर
रिश्तों की गहराई समझकर
गहराई का अंजाम हो जाएं
अब काम के काम हो जाएं

दुनियादारी से न तोल कर
शौकों की गुल्लकें खोल कर
बस शौकीनों का ही मोल कर
उनमें ही नीलाम हो जाएं
अब काम के काम हो जाएं

एक और हकीकत है, जानकर
मायाजाल को हैरान कर
रूहानी सच्चाई  मानकर
उस सच में ही तमाम हो जाएं 
चलो जवानी से पीछा छूटाें
अब काम के काम हो जाएं 
नोन तेल लकड़ी के आगे 
कुछ नए मकाम हो जाएं