मेरी ज़िन्दगी में तू
मेरा हमसफ़र नहीं
के मैं किस तरफ चला
ये तुझे खबर नहीं
मेरे काफिले में हैं
वो अज़ीज़ बेशुमार
जो हैं तो आस पास
पर उस कदर नहीं
कयामतों के झोंके
बरज़ोर मुझपे बरसे
तेरी याद को भुला दें
उनमें असर नहीं
राहों में कितनी भटका
और चौखटों को ताका
तेरे आंगनों की ज़िद्द थी
यूं दर-ब-दर नहीं
बेताबी बस ये रहती
हर सुबह तुझको देखूं
किस्मत में मेरी पर ये
हसीं सहर नहीं
ज़माने ने दाद भी दी
बहुतों ने मुझको चाहा
जो तक रहीं हैं उनमें
तेरी नज़र नहीं
तू मुनसियत है मेरी
तेरी आशिकी की लत है
दुनिया में आशिकी से
बढ़कर ज़हर नहीं