Wednesday, February 24, 2021

मंदिर


मंदिर 

अंतर्मन के मंदिर को
भौतिकता से जोड़ दिया
और बर्बरता के खँडहर को
बर्बरता से तोड़ दिया

एक विशाल जनमानस को
निद्रा से झकझोर दिया
अति नम्र मानवता को
नाश के मुख से मोड़ दिया

इतिहास के भावी पन्नो से
हास्य रस निचोड़ दिया
झूट के साहूकारों के
कथनों ने कफ़न ओढ़ लिया

अन्धकार की सदियों को
एक नया उदय और भोर दिया
कड़वे कोलाहल से कोमल
शंकों का पावन शोर दिया

बहुरंगी इस धरती पर
केसर को थोड़ा ज़ोर दिया
और कच्चे रंग सा जो बहता था
उस केसर ने बहना छोड़ दिया

अंतर्मन के मंदिर को
भौतिकता से जोड़ दिया
और बर्बरता के खँडहर को
बर्बरता से तोड़ दिया

मसरूफ़ियत की ढाल

 

ये कैसे दुश्मनी है

मेरी मेरे ख्यालों से

मुहब्बतों में उलझे

अनकहे सवालों से

अक्सर रातें जाग कर 

ख़्वाबों से जूझती है

रोज़ अकेलेपन में ये

हाल-ए-दिल पूछती हैं

ये शतरंज की बिसात है 

अजीब-ओ-गरीब जंग है

मोहरे स्याह सफ़ेद हैं

चालों का और ही रंग है

हमला सब तरफ से है

तलवार कहीं तो भाल है

घायल हुआ ख्यालों से  

मसरूफ़ियत ही ढाल है