Sunday, February 27, 2022

पगडण्डी

बहुत अरसे से मजमों संग 

उन्हीं की चाल, उन्हीं के ढंग 

में चौड़ी सी सड़क पे चल 

के ढूंढे ज़िन्दगी के हल


उम्मीदों की भरी मंडी

से हटकर एक वो पगडण्डी

मिली मुझको तो मैं ठहरा

सफर का था नया चेहरा


ये पगडण्डी है पतली सी

टेढ़ी मेढ़ी और मचली सी

हर कदम पे अंगड़ाई 

सफर में  मंज़िलें पाई 


मसरूफ भी हूँ, फुर्सत भी है

तनहा भी हूँ, कुर्बत भी है

उड़ जाता हूँ ख्यालों पर 

रुक जाता हूँ, दोराहों पर 


दोराहे इंतेखाब नहीं

हर लम्हे का हिसाब नहीं\

दो राहों पर भी चलता हूँ

गिरता भी हूँ फिसलता हूँ


डगरों की अब फ़ौज लगी है

हर डगर पर मौज लगी है

पगडंडियों से यारी है

और उम्र पड़ी अब सारी है