चला ज़िक्र तो हमने भी बात की
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .
सुरूर ढून्ढ लेता है दर्द के ठिकानो को
आज फिर इस शराब ने तहकीकात की.
बिन बुलाये मेहमान की तरह यारों
आसुओं ने चेहरे पे बरसात की.
कहते हैं की वक़्त हर घाव भर देता है
आस कब तक रखूँ इस करामात की.
खून से तुझपर लिखता हूँ शायरी संजीव
कदर नहीं तुझे क्या इस कीमती दवात की?
चला ज़िक्र तो हमने भी बात की
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .
सुरूर ढून्ढ लेता है दर्द के ठिकानो को
आज फिर इस शराब ने तहकीकात की.
बिन बुलाये मेहमान की तरह यारों
आसुओं ने चेहरे पे बरसात की.
कहते हैं की वक़्त हर घाव भर देता है
आस कब तक रखूँ इस करामात की.
खून से तुझपर लिखता हूँ शायरी संजीव
कदर नहीं तुझे क्या इस कीमती दवात की?
चला ज़िक्र तो हमने भी बात की
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .