बचपन का मोहल्ला था
मासूमियत की गली थी
ज़िन्दगी को परखने की
दो दिलों में खलबली थी
लड़कपन के मैदानों में
जवानी से मुलाक़ात हुई
यारी के चौराहे पे
मुहब्बतों की बात हुई
गेंद बल्ला चोर सिपाही
यह खेल भी खेले थे
हमारे लिए तो दुनियादारी
मस्त दिवाली मेले थे
ज़िन्दगी की दौड़ भी दौड़ी
साथ साथ ही दौड़े थे
यार के सर पे बोझ पड़ा तो
कंधे अपने चौड़े थे
कच्ची पक्की नसीहतों को
आपस में बांटा करते थे
भले बुरे का फर्क भी खुद ही
आपस में छाँटा करते थे
उम्मीदों के महल बनाते
छुट्टी की दोपहरों में
छोटी छोटी फ़तेह को तकते
एक दूजे के चेहरों में
वक़्त आया जब इस दिल को
देने का नाज़ुक हाथों में
कैसे दायरा बढ़ा दिया
यारी का चंद मुलाकातों में
दो यारों से चार हुए तो
यारी के रंग कुछ और चढ़े हैं
यारी लव्ज़ कुछ छोटा है
ये तालुक्कात कुछ और बढ़े हैं
अंकल चाचा के ओहदों से
खुद अपनी हस्ती बढ़ा ली है
हर मौके पे ना ना करते भी
थोड़ी बहुत चढ़ा ली है
दिल से पूछो क्या मिलता है
हम को इन मुलाकातों में?
ऐसा क्या है इस रिश्ते में
क्या लुत्फ़ पुरानी बातों में?
लड़कपन का आईना तू है
बचपन का है खज़ाना तू
ठहाकों वाली हंसी तेरे संग
बेफिक्र ख़ुशी का ठिकाना तू!
सालगिरह पे सलाह है तुझको
जन्नत की हसरत करना मत
यहीं है जन्नत, यहीं है कुर्बत
तब्दील-ए-फितरत करना मत
तोरण सजी दरवाजों पर
चरक चढ़ी लिबाजों पर
लड़ियों के घूंघट
हर घर ने ओढ़े
मिठाई ने रिश्ते
पडोसी से जोड़े
ताश के पत्ते
जिताते हराते
रिवाजों में कैसी
हरकत ये पाते
के ख़ुशी बेवजह
शोर मचाती है
गम के अँधेरे का
गला घोट जाती है
तुम्हे भी ख़ुशी का
पूरा सा हक़ हो
जादू दिवाली का
मुबारक हो
मुबारक हो
मुबारक हो