मुजस्समा खुद का मैंने ख्यालों में तराशा है
मुकम्मल है जो ख़्वाबों में, हकीकत में हताशा है
मुझे न मिल सका वो शक़्स जो हर पहलू से उम्दा हो
हज़ारों आइनों में मैंने उसी को ही तलाशा है
तेरी शिद्दत, तेरी फितरत, तेरा जज़्बा ही सब कुछ है
हुस्न तेरा, अदा तेरी, ये जलवा तो तमाशा है
बस एक वो बात है मुझ में ज़माने से जो ऊपर है
मुझे तेरी ही रग रग से मुहब्बत बेतहाशा है
हैवानों से क्या बोलें वो कड़वाहट ही चखते हैं
वो क्या जानें के मीठापन तो चाहत का बताशा है
मुक्तलिफ़ ज़ुबानों से ये दुनिया बट गयी ऐसे
आशिकाना शायरी ही जुड़वाने की भाषा है