Saturday, September 21, 2024

मैं भटक गया था main bhatak gaya tha

 मेरे सामने थी मंज़िल 

पर मैं भटक गया था 

सब कुछ था मुझको हासिल  

पर मैं भटक गया था 


करी इश्क़ की वकालत 

जीती हुई थी बाज़ी 

मेरा दिल था मुव्वक्किल 

पर मैं भटक गया था 


वो कारवाँ था जिसमें 

हर ख्वाब था मयस्सर 

थी तू भी उसमें शामिल

पर मैं भटक गया था 


तूफ़ान से बचाके

मैं कश्ती लेके आया

वो सामने था साहिल

पर मैं भटक गया था


शेरों को मेरे सुनने 

बेसब्र था ज़माना

पूरी सजी थी महफ़िल

पर मैं भटक गया था


Thursday, September 5, 2024

अच्छा लगता है ahcha lagta hai

 

अंधेरों से बाहर आना अच्छा लगता है

इन आँखों का चौंधियाना अच्छा लगता है

नई नस्ल के नए तरीके हम भी सीखेंगे 

अपनी हिकमत को चमकाना अच्छा लगता है      


शिकनों के घावों को हम तनहा सेह लेंगे  

महफिलों में मुस्कुराना अच्छा लगता है


हम दौड़ लिए दुनियादारी की रफ्तारों से

अब इन लम्हों को टहलाना अच्छा लगता है 


दूर चले जाते हैं जिनको जाना होता है 

तेरा जाके वापस आना अच्छा लगता है 


दिल न मांगे इतना सब कुछ  तेरी निस्बत से 

महज़ नज़र का एक नज़राना अच्छा लगता है


साथ तेरे चलते चलते जब पीछे रह जाऊं 

तेरा थोड़ा सा घबराना अच्छा लगता है


मुरीद हुई आखिर मेरी तू इतनी शिद्दत बाद

अब तुझे थोड़ा तरसाना अच्छा लगता है 

  

सच्चाई जैसी हो अपनी वैसी जी लेंगे

पर हम दोनों का अफसाना अच्छा लगता है 


मेरे शेरों को ये दुनिया चाहे न चाहे  

तेरा उनको गुनगुनाना अच्छा लगता है