जिस नादान को दो वक़्त की रोटी नसीब न थी
वो खैरात में मिली फुलझड़ी का क्या करेगा?
सोचा तो यही था मैंने... पर उसकी मुस्कान देख कर
लगा की ख़ुशी तो बहाना ढूंढ़ती है दिल में घर करने का
जिस नादान को दो वक़्त की रोटी नसीब न थी
वो खैरात में मिली फुलझड़ी का क्या करेगा?
सोचा तो यही था मैंने... पर उसकी मुस्कान देख कर
लगा की ख़ुशी तो बहाना ढूंढ़ती है दिल में घर करने का
गुज़रते वक़्त ने
हलकी आंच की तरह
रिश्तों को सेका है.
आपसी ज़रूरतों
और जस्बातों के छौंक
लगे हैं इनमें.
नए रिश्ते शायद
इसीलिए
थोड़े कच्चे लगते हैं.
जुबां और दिल में
यही फर्क है
क्योंकि नए रिश्ते
हम फिर भी चखते हैं.
पढ़ा था नुजूम ने
जो हाल-ए-दिल तेरा
रू-ब-रू है तेरे
वो मुस्तकबिल तेरा
कायनात ने कर दिए
जो इंतज़ाम हैं
मेरे कारवाँ में नाम अब
है शामिल तेरा
ये मुख्तलिफ सी डोर हैं गाठें हज़ार हैं
कुछ महज़ सूत के कुछ रेशम के तार हैं
उलझे भी हैं, सुलझे भी ये कुरबतों के लच्छे
हर रंग में डूबी हुई कशिश का सार हैं
एक सिरे पे मैं खड़ा कुछ दूरी पे तू
डोरियों में मैं फंसा मजबूरी में तू
ये डोरियों का बंधन महीन और महका सा है
तेरे इत्र में मैं रमा कस्तूरी में तू
महके हुए नशे में एक दूजे को थाम
रेशमी डोरियों से बुन रहे मकाम
दिल पतंगा हो गया शम्मा को चाहता है
चाहत को अफ़साने का दे देंगे अंजाम
मुलाकातों की खुशबू में मेरे ये दिन गुज़रते हैं
इत्तर तेरा महेकता है फक्र गुलज़ार करते हैं
पुरानी है वो खुशबू और वो किस्से भी पुराने हैं
नए अलफ़ाज़ में उलझे ये शेरों में उमड़ते हैं
चुराते हैं वो बारिश से तरी मिट्टी का सोंधापन
तेरे अहसास के झोंके मेरी साँसों को भरते हैं
अगरबत्ती की शिद्दत है तेरी यादों के धुंए में
के हम तो राख ही बनकर हर दिन यूं बिखरते हैं
ये खुशबू ही तो ज़ालिम है हवाओं में मचलती है
मेरे तो ख्वाब इसी को ढून्ढ तरसते और निखरते हैं
तेरी दुनियासे बिछड़े पल हैं जैसे आग में संदल
उसी माफिक मेरे जज़्बात महक महक के मरते हैं
मुलाकातों की खुशबू में मेरे तो दिन गुज़रते हैं
इत्तर तेरा महेकता है कई गुलज़ार संवरते हैं
बहुत अरसे से मजमों संग
उन्हीं की चाल, उन्हीं के ढंग
में चौड़ी सी सड़क पे चल
के ढूंढे ज़िन्दगी के हल
उम्मीदों की भरी मंडी
से हटकर एक वो पगडण्डी
मिली मुझको तो मैं ठहरा
सफर का था नया चेहरा
ये पगडण्डी है पतली सी
टेढ़ी मेढ़ी और मचली सी
हर कदम पे अंगड़ाई
सफर में मंज़िलें पाई
मसरूफ भी हूँ, फुर्सत भी है
तनहा भी हूँ, कुर्बत भी है
उड़ जाता हूँ ख्यालों पर
रुक जाता हूँ, दोराहों पर
दोराहे इंतेखाब नहीं
हर लम्हे का हिसाब नहीं\
दो राहों पर भी चलता हूँ
गिरता भी हूँ फिसलता हूँ
डगरों की अब फ़ौज लगी है
हर डगर पर मौज लगी है
पगडंडियों से यारी है
और उम्र पड़ी अब सारी है
वो धूप थोड़ी ख़ास थी
कैसे बयां करूँ
बहुत दिनों से आस थी
कैसे बयां करूँ
कुर्बत के एक सिरे को
पकडे खड़ा था मैं
अरसे से इसी ज़िद्द पे
जमकर अड़ा था मैं
आज तू भी कितने पास थी
कैसे बयां करूँ
उमंगों की महफ़िल थी
कैसे बयां करूँ
अदाएं तेरी कातिल थीं
कैसे बयां करूँ
जज़्बातों के मज़मून
किताबों से पढ़ दिए
तस्वीरों से वो लम्हे
यूँ यादों में जड़ दिए
उस टीले पे झिलमिल थी
कैसे बयां करूँ
बातों में एक रुझान था
कैसे बयां करूँ
रूमानी आस्मान था
कैसे बयां करूँ
चाय के गर्म प्याले का
नसीब देख लो
चुस्की भी लेलो चाव से
और हाथ सेख लो
मेरा भी वो अरमान था
कैसे बयां करूँ
ललक लड़कपन की लाये
हलचल ह्रदय की हर्षाये
वर्षों विलम्बित और वंचित
संयोगता से सुसंचित
मधुर मिलन मंशानुसार
सुदृढ़ हुआ ये साक्षात्कार
तृष्णा तेरी, मेरा तर्पण
दृष्टि तेरी, मेरा दर्पण
अर्चन तेरी, मेरा अर्पण
मीठा मनोभावित मिश्रण
सरल संभावों का स्पंदन
है आलोकिक ये आलिंगन
मसला इतना गंभीर नहीं
चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं
इज़हार-ए-मुहब्बत तो है पर
कोई पत्थर पे लकीर नहीं
मौसम बदलते हैं दिल के
तू चार कदम तो चल मिल के
इसमें तो कुछ तक़रीर नहीं
मसला इतना गंभीर नहीं
बहक जाते हैं सबके मन
तू भी दिखाले अपनापन
मैं संत नहीं तू पीर नहीं
मसला इतना गंभीर नहीं
तौबा के ये हालात मिलें
के इश्क़ मुझे खैरात मिले
आशिक़ हूँ मैं, फ़क़ीर नहीं
मसला इतना गंभीर नहीं
चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं