यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे
ख़्वाबों में अपने रोज़ बुलाती हो तुम मुझे
के घूमता रहता हूँ ख्यालों में रात दिन
घुमा घुमा के रोज़ थकाती हो तुम मुझे
यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे
अरमान तुम्हारे भी मुकम्मल ज़रूर हों
शिकवे गिले जो हैं एक इशारे से दूर हों
शिद्दत से जो करती हो वो सुनते हैं दुआ हम
दुआओं की बंदिश में बंधाती हो तुम मुझे
यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे
संजीदगी से ज़िन्दगी को देख लो मगर
सफर तो सिर्फ एक है, पर लाख हैं डगर
हंसी ख़ुशी चलती रहो पर याद ये रखो
हंसाता तुम्हें मैं हूँ, हंसाती हो तुम मुझे
यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे
कितना भी धकेलो मुझे तुम फ्रेंड ज़ोन में
तस्वीर मेरी छिपी तुम्हारे भी फ़ोन में
अपनी अदाओं से और अपने ही लहज़े से
फेसबुक के ज़रिये रिझाती हो तुम मुझे
यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे