ये दौर-ए-हालात हैं अजीब-ओ-गरीब से
के अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से
जस्बातों की चादर में सलवट भी देखी
रिश्तों की नींद में करवट भी देखी
उम्मीदों के आँगन में दीवार भी थी
और प्यार के दरिया में दरार भी थी
दुखती हुई नव्ज़ को खामोश भी देखा
अनकहे अलफ़ाज़ का रोष भी देखा
देखा कई अरमां नज़रअंदाज़ थे
और कई आम मुद्दे छुपे राज़ थे
ये मन मुटाव के बादल सालों घिरते रहे
हम मसरूफियत की चादर ओढ़े फिरते रहे
जब हुए करोना-क़ैद घर में नसीब से
अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से
के अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से
जस्बातों की चादर में सलवट भी देखी
रिश्तों की नींद में करवट भी देखी
उम्मीदों के आँगन में दीवार भी थी
और प्यार के दरिया में दरार भी थी
दुखती हुई नव्ज़ को खामोश भी देखा
अनकहे अलफ़ाज़ का रोष भी देखा
देखा कई अरमां नज़रअंदाज़ थे
और कई आम मुद्दे छुपे राज़ थे
ये मन मुटाव के बादल सालों घिरते रहे
हम मसरूफियत की चादर ओढ़े फिरते रहे
जब हुए करोना-क़ैद घर में नसीब से
अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से