Tuesday, April 28, 2020

करोना-क़ैद

ये दौर-ए-हालात हैं अजीब-ओ-गरीब से 
के अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से

जस्बातों की चादर में सलवट भी देखी
रिश्तों की नींद में करवट भी देखी

उम्मीदों के आँगन में दीवार भी थी
और प्यार के दरिया में दरार भी थी

दुखती हुई नव्ज़ को खामोश भी देखा
अनकहे अलफ़ाज़ का रोष भी देखा

देखा कई अरमां नज़रअंदाज़ थे
और कई आम मुद्दे छुपे राज़ थे

ये मन मुटाव के बादल सालों घिरते रहे 
हम मसरूफियत की चादर ओढ़े फिरते रहे 

जब हुए करोना-क़ैद घर में नसीब से
अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से 

Tuesday, April 14, 2020

शीशों की दीवार

रोशिनी मेरे कमरे 
में कम तो नहीं है
तेरी परछाइयों का ज़ालिम
पर ये सितम तो नहीं है 
मन टटोलता है
दूरियों के अँधेरे
कुछ लम्हों की मशाल
भी हाथ में है मेरे
गुफ्तगू की चिंगारियां 
ख़यालों में झूमती हैं
दीवानगी की जुगनी  
बंद घर में घूमती है 
ये घर भी कुछ अजीब है
के शीशों की दीवार है
घर में बहुत अज़ीज़ हैं
तू है, मगर उस पार है।

Wednesday, April 1, 2020

ज़हर


कैसा ये दौर है कैसा ये शहर है?
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़मीन तो खुश है आसमान चहकता है
जंगल जवां है बाग़ फिर महकता है
दरियाओं  में भी उमंग की लहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

छाती फैलाकर  दरख़्त तो बुलंद हैं
इंसानी इरादों का कारखाना बंद है
वक़्त की चाल में कैसा ये पहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

तितली नाचती है भवरा गुनगुनाता है
यार दूर रहते हैं मोर छत पे आता है
जुगनू की रात है परिंदों की सहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ख्वाहिश पे ताला  मंसूबों की हड़ताल  
ताकतों की शिकस्त कीटाणु का कमाल 
सवाल पूछते हैं मंथन है या कहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़हर हज़म कर या उगल दे बहार
कुदरत को दोष दे या खुद कर इकरार   
तेरी करतूतों की तुझ पर ही मेहर है
कैसा ये दौर हैcकैसा ये शहर है 
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है