Wednesday, November 23, 2016

कुछ ख़ास नहीं

कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं
यूहीं ख़यालों में मुस्कुराती हो
सपनों में आती जाती हो
कई जस्बात जगाती हो
जिनके लिए अलफ़ाज़ नहीं
कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं
टूटी फूटी यादें भी हैं
सपने रंगीन कुछ सादे भी हैं
कुछ मंज़िलों के इरादे भी हैं
कुछ दूर सही, कुछ पास नहीं
कुछ कहना है तुमसे
मगर कुछ ख़ास नहीं
चाहत भी है, सुकून भी है
शायरी में मेरा कुछ खून भी है
ठहराव भी है और जुनून भी है
शायद तुम्हे एहसास नहीं
कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं

Friday, November 18, 2016

मेरे जाने के बाद


कुछ अश्रु तो गिरेंगे
मेरे जाने के बाद
कुछ दिए तो जलेंगे
मेरे जाने के बाद
यादें धुंदली होती भी हैं
तन्हाई काम चुभोती भी है
कुछ चर्चे काम चलेंगे
मेरे जाने के बाद
क्या कमाया, क्या गंवाया
किसका हक़, किसका सरमाया
किसके हाथों ये संभलेंगे
मेरे जाने के बाद 

उम्मीदें उजालों की मोहताज नहीं होतीं

सारे चिराग बुझाने के बाद
साफ़ नज़र आता है तेरा साया मुझे
उम्मीदें उजालों की मोहताज नहीं होतीं
यह राज़ अब समझ आया है मुझे
न तारों की चमक, न मशालों की आग
तेरी चाहत ने सफर कराया है मुझे
छोड़ जाता ये महफ़िल गर तू शरीक न होती
तेरी रौनक ने चुपचाप मनाया है मुझे

तेरी पहचान

घुटन खुले आसमान में क्यों है?
धूल की चिलमन रोशनदान में क्यों है?
सब कुछ है मेरी बाहों में लेकिन
मेरी यादों में वो तेरी पहचान क्यों है?

Friday, November 4, 2016

आज कल मेरे ख्वाब...

आज सूरज चाँद सा क्यूँ लग रहा है?
इंसान शायद रात को ज़यादा जग रहा है
धूप में गर्माहट नहीं, रोशिनी भी नम है
आज कल दिनों में शराफ़ते भी कम है
धुआं सा उठ रहा है, जाने क्या जल रहा है
हैवान राख चिताओं की माथे पे मल रहा है

खामखां दुनिया की फ़िक्रों को सोख्ते हैं
ख्वाब मेरे ऐसे ...नींदों को चोंकते हैं

फासले

इश्क़ फासलों का मोहताज न हो जाये
ये आशिक़ तन्हाई से नाराज़ न हो जाये
दूरियों का बहाना तो पुराना है मेरी जान
इस का अहसास मुझे आज न हो जाये
हम तो खतों में रूमानी हो चले हैं
न मिलना मगर तेरा अंदाज़ न हो जाये
तेरी शान में बुनते हैं काफियों के काफिले
तेरी बेरुखी से कड़वे मेरे अलफ़ाज़ न हो जाएं
बीमार हूँ तेरे हुस्न का, ए हूर की परी
नामौजूदगी तेरी मेरा इलाज न हो जाये
इश्क़ फासलों का मोहताज न हो जाये
ये आशिक़ तन्हाई से नाराज़ न हो जाये

तस्वीर




ये होठों की रंगत
कुछ ज़्यादा ही है
ये मस्ती की संगत
कुछ ज़्यादा ही है
मोना लीसा की भाँती
ये हलकी तबस्सुम
हलकी है भी मगर
कुछ ज़्यादा ही है
चेहरे को छू कर
वो ज़ुल्फ़ों का गिरना
चश्मे से चेहरे का
कुछ और निखरना
इस धड़कन से पूछो
कुछ ज़्यादा ही है