Wednesday, November 7, 2018

जादू दिवाली का

तोरण सजी दरवाजों पर
चरक चढ़ी लिबाजों पर
लड़ियों के घूंघट 
हर घर ने ओढ़े 
मिठाई ने रिश्ते
पडोसी से जोड़े
ताश के पत्ते
जिताते हराते
रिवाजों में कैसी
हरकत ये पाते
के ख़ुशी बेवजह
शोर मचाती है
गम के अँधेरे का
गला घोट जाती है
तुम्हे भी ख़ुशी का
पूरा सा हक़ हो
जादू दिवाली का
मुबारक हो
मुबारक हो
मुबारक हो

खेल समझ के खेल ले

बैठा हूँ चौकड़ी मार कर
मैं कुछ वाक़िफ़ों के संग
माहौल दीपावली का है
और दाव पे हैं चार रंग

कोई हुकुमरान है
तो कोई चिड़ी का है गुलाम
किसी का बैर है ईंट सा
सिर्फ दिलकशी किसी का काम

हर वजूद है दाव पे
हर शक़्स है एक चाल पर
आज जीत है के हार है
सब टिके हैं इस सवाल पर

अरे जीत का जष्न मना
और हार है तो झेल ले
ये ज़िन्दगी का खेल है
खेल समझ के खेल ले

तू रावण नहीं मैं राम नहीं

बुराई का अंजाम नहीं
भले को इनाम नहीं
ये दौर को परखो यहां
हलाल नहीं हराम नहीं

कालिक मैं भी सफेदी है
सच्चा भी मन का भेदी है
फरिश्तों की शोहरत नहीं
हैवान यहाँ बदनाम नहीं

मैं भी तो गुनेहगार ही हूँ
खामियों का हिस्सेदार भी हूँ
तू दुश्मन सही पर दशमी पर
तू रावण नहीं मैं राम नहीं