पिंजरे में रात दिन फड़फड़ाती हैं क़ैद में ये कितना करहाती हैं! खोल दिया पिंजरा तो उड़ जाएँगी कहीं दर्द भरी यादें फिर सताएंगी नहीं तू पिंजरा खोलने से क्यों घबराती है?
दबे सुरों में ग़ज़ल गुनगुनाने लगा हूँ मैं ज़िन्दगी से कुछ लम्हे चुराने लगा हूँ मैं लापता है वो वक़्त ज़माने की नज़र में तेरे साथ में जो तन्हा बिताने लगा हूँ मैं