Sunday, December 16, 2018

पिंजरा


पिंजरे में रात दिन फड़फड़ाती हैं
क़ैद में ये कितना करहाती हैं! 
खोल दिया पिंजरा तो उड़ जाएँगी कहीं
दर्द भरी यादें फिर सताएंगी नहीं 
तू पिंजरा खोलने से क्यों घबराती है?

लापता वक़्त

दबे सुरों में ग़ज़ल
गुनगुनाने लगा हूँ मैं
ज़िन्दगी से कुछ लम्हे
चुराने लगा हूँ मैं
लापता है वो वक़्त
ज़माने की नज़र में
तेरे साथ में जो तन्हा
बिताने लगा हूँ मैं