बढ़ गए हैं फासले कशिश बुलंद रही
तेरी बेरुखी भी हमको पसंद रही
बस इस उम्मीद पर ही के तू खाब में दिखे
रत जगे किये थे पर आँखें बंद रहीं
बेशुमार हैं सितम तूने जो थे किये
हसीं लम्हों की याद मेरे पास चंद रहीं
शर्तें वो प्यार की मंज़ूर न थी तुझको
चाहत मेरी हर शर्त से रज़ामंद रही
सुलग रहा था मैं जब उल्फत की आग में
तेरी तरफ से लौ थोड़ी मंद मंद रही