जिस नादान को दो वक़्त की रोटी नसीब न थी
वो खैरात में मिली फुलझड़ी का क्या करेगा?
सोचा तो यही था मैंने... पर उसकी मुस्कान देख कर
लगा की ख़ुशी तो बहाना ढूंढ़ती है दिल में घर करने का
गुज़रते वक़्त ने
हलकी आंच की तरह
रिश्तों को सेका है.
आपसी ज़रूरतों
और जस्बातों के छौंक
लगे हैं इनमें.
नए रिश्ते शायद
इसीलिए
थोड़े कच्चे लगते हैं.
जुबां और दिल में
यही फर्क है
क्योंकि नए रिश्ते
हम फिर भी चखते हैं.