Thursday, May 18, 2017

शहनाई

तेरे लव्ज़ों और ज़ुल्फ़ों में फर्क समझा दे
दोनों में शायरी बस्ती है शायद 
अल्फ़ाज़ों में उमंगें उलझें कुछ ऐसे
बालों में हवाओं की मस्ती है शायद 

तेरे लव्ज़ों और आँखों में फर्क समझा दे
दोनों में बहुत गहराई है शायद
अलफ़ाज़ कुरेदें कुछ छिपे हुए सच
आँखों में डूबी सच्चाई है शायद

तेरे लव्ज़ों और होठों में फर्क समझा दे
दोनों में रूह मुस्कुराती है शायद
अलफ़ाज़ जज़्बातों के कई राज़ खोलें
तबस्सुम कई राज़ छुपाती है शायद

तेरे लव्ज़ों और अदा में फर्क समझा दे
दोनों में कमाल की अंगड़ाई है शायद
अल्फ़ाज़ों के फेर मैं जादू है इतना
अंदाज़ की तेरे परछाई है शायद

तेरे लव्ज़ों और वजूद में फर्क समझा दे
एक दूजे को दोनों सजाते हैं शायद
अलफ़ाज़ शख्सियत का नौशा है और 
हम जैसे ?
हम जैसे शहनाई बजाते हैं शायद 

मेरे लव्ज़ों और हसरत में फर्क समझा दे
दोनों में कुछ बुत-परस्ती है शायद
इस उम्र में अंदाज़-ए-बयां है गर ऐसा
दोनों पे छुप कर तू हंसती है शायद 


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