Thursday, October 4, 2018

ख्वाहिश

ख्वाहिशों का बादल
आसमान में उड़ता रहा
ज़रूरतों के वज़न से
मैं ज़मीन से जुड़ता रहा

ऊंचाइयों की ललक में जो
मैं बेबाक लपकता रहा
वो बादल ख्वाहिशों का
थोड़ा थोड़ा टपकता रहा

ये कैसी बरसात थी
के प्यास तो तरी नहीं
ख्वाहिशों की ख्वाहिश में
ज़िन्दगी की गागर भरी नहीं

गागर, सागर, नदी , तालाब
सब तो मेरे वश में थे
पानी के हज़ारों रंग सब
मेरे आँगन के कलश में थे

एक दिन उतार लिया बादल को
ये करिश्मा भी हो गया
हाथ लगा सिर्फ धुंद घना
और मेरे घर का रस्ता खो गया

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