कभी सोचता है होठों को तेरे
छु ले मगर रुक जाता है
रुका न जो तीर-ओ-खंजर से
खा वार-ए-नज़र रुक जाता है
ढूंढ़ता फिरता है सुकून मुसाफिर जो
पहुंचके तेरे घर रुक जाता है
दिन के कारवां में झलक तेरी
दिख जाये तो सफर रुक जाता है
कभी सोचता है होठों को तेरे
छु ले मगर रुक जाता है
छु ले मगर रुक जाता है
रुका न जो तीर-ओ-खंजर से
खा वार-ए-नज़र रुक जाता है
ढूंढ़ता फिरता है सुकून मुसाफिर जो
पहुंचके तेरे घर रुक जाता है
दिन के कारवां में झलक तेरी
दिख जाये तो सफर रुक जाता है
कभी सोचता है होठों को तेरे
छु ले मगर रुक जाता है
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