टप टप करके
गपशप करके
इन बूँदें ने बारिश की
खिलखिलाकर
छपछपाकर
नटखटियों से साज़िश की
गढ़ गढ़ करके
बड़ बड़ करके
गर्जन काली बदरी की
शोर मचाकर
तैश दिखाकर
स्वांग रचें बेकद्री की
खूब कड़क के
तेज़ भड़क के
तांडव जो है बिजली का
चकाचौंध कर
गगन फांद कर
नर्तन है मन मचली का
चेह चाहाके
पर झटकाके
पनाह ली परिंदों ने
डाल डाल पे
पात पात पे
जश्न करा बाशिंदों ने
गदगद होकर
सुधबुध खोकर
खिड़की से मैं झाँक रहा
भीगे दर्पण
में मैं बचपन
के वो नज़ारे ताक रहा
बौछारों की
ललकारों की
आ गया मैं बातों में
बाहर आकर
झिझक हटाकर
भीगा मैं बरसातों मैं
बच्चे बनकर
ऐसे धुलकर
हम यादों में खूब गए
कुछ दूरी में
मजबूरी में
कितनों के सपने डूब गए
No comments:
Post a Comment