Saturday, January 20, 2024

हमसफ़र hamsafar

 मेरी ज़िन्दगी में तू

मेरा हमसफ़र नहीं

के मैं किस तरफ चला

ये तुझे खबर नहीं

मेरे काफिले में हैं

वो अज़ीज़ बेशुमार

जो हैं तो आस पास 

पर उस कदर नहीं


कयामतों के झोंके

बरज़ोर मुझपे बरसे

तेरी याद को भुला दें 

उनमें असर नहीं


राहों में कितनी भटका

और चौखटों को ताका 

तेरे आंगनों की ज़िद्द थी 

यूं दर-ब-दर  नहीं 


बेताबी बस ये रहती 

हर सुबह तुझको देखूं

किस्मत में मेरी पर ये

हसीं सहर नहीं 

 

ज़माने ने दाद भी दी

बहुतों ने मुझको चाहा

जो तक रहीं हैं उनमें

तेरी नज़र नहीं


तू मुनसियत  है मेरी

तेरी आशिकी की लत है

दुनिया में आशिकी से 

बढ़कर ज़हर नहीं

No comments:

Post a Comment