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Tuesday, March 4, 2025

प्रथम वंदना pratham vandana

मोह छल कपट रहित

निःस्वार्थता सहित

सभ्य शांत और कुलीन 

सत वचन में विलीन 

प्रेम की भण्डारिणी 

मोहिनी मन मोहिनी 


शुद्धता की प्रतीक

हर कथन में एक सीख

नम्रता व्यवहार में 

दृढ़ता विचार  में

कोमल ह्रदय की स्वामिनी

मोहिनी मन मोहिनी


चट्टान आपदाओं में 

सादगी दुआओं में 

ब्रह्माण्ड उसकी गोद में

निर्वाण उसके शोध में 

मेरी मार्गदर्शिनी

मोहिनी मन मोहिनी


मुझे दिया है ज्ञान पर

अंकुश अभिमान पर

गर्व मेरी शान पर

जान मेरी जान पर

माँ नहीं पारसमणि

मोहिनी मन मोहिनी 

Thursday, January 30, 2025

उफ़ुक़ ufuq

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 

उजिआलों में जश्न मनें और अंधेरों में मस्ती है  

तूफानों में पतंग उड़ाएं बरसातों में मेले हैं 

यारों की टोली होती हैं, और यारी के रेले हैं

खुशियों के बाज़ार लगें हर चीज़ वहां पे सस्ती है 

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 


नाकामी के बोझ बिना तो हर एक शक़्स इतराएगा

ऐसा है माहौल वहां के जो चाहेगा पायेगा 

हर खिड़की पे लटक रहे हैं रंग बिरंगे सपने भी

हाथ बढ़ाओ और पकड़ लो, प्यारों के और अपने भी

साम दाम और दंड भेद की डूब रही हर कश्ती है 

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 


दौड़ रहा मैं देखो कैसे उस बस्ती तक जाने को

उस जन्नत की रंगरलियों को सबके साथ मनाने को

मेरी मंज़िल का ठिकाना उस उफ़ुक़ के आगे है

पर ये कम्बख्त उफ़ुक़ मेरे आगे आगे भागे है

उस बस्ती की एक झलक को मेरी आँख तरसती है

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 


तूफानों से जूझ रहा मैं, बरसातों में भीग रहा

साम दाम और दंड भेद के सारे सबब सीख रहा

छीना छपटी सपनों की है, मैं भी तो इस होड़ में हूँ 

पा जाने की दौड़ लगी है, मैं भी तो इस दौड़ मैं हूँ 

ऐसे ही सारी दुनिया इस माया जाल में फस्ती है 

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है