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Sunday, August 10, 2025

वो बहुत दूर चला गया vo bahut door chala gaya

बढ़ गए हैं फासले कशिश बुलंद रही

तेरी बेरुखी भी हमको पसंद रही 


बस इस उम्मीद पर ही के तू खाब में दिखे

रत जगे किये थे पर आँखें बंद रहीं 


बेशुमार हैं सितम तूने जो थे किये 

हसीं लम्हों की याद मेरे पास चंद रहीं 


शर्तें वो प्यार की मंज़ूर न थी तुझको

चाहत मेरी हर शर्त से रज़ामंद रही 


सुलग रहा था मैं जब उल्फत की आग में 

तेरी तरफ से लौ थोड़ी मंद मंद रही 

Tuesday, July 15, 2025

शायर की उम्मीद shayar ki ummeed

ऐलान ऐ मुहब्बत का वादा नहीं है

वो दिल जीतने पे अमादा नहीं है

मेहबूबा  पे वो जां छिड़कने है आया

कुछ पाने का उसका इरादा नहीं है


अधूरी रहेगी ये दास्ताँ ऐ उल्फत   

पर इश्क़ ये हरगिज़ भी आधा नहीं है


बेवफाई का रास्ता है टेढ़ा मेढ़ा

और वफ़ा का भी सीदा सादा नहीं है 


सियासत के ठेकेदारों का रुतबा 

दौलत और दम है, मर्यादा नहीं है 


बिसात के आखिरी घर पे जो अदना है

चालों का राजा है, वो प्यादा नहीं है


वाह वाही की गूँजें, ये तालियों का शोर

शायर की उम्मीद इससे ज़्यादा नहीं है 


Saturday, June 21, 2025

मुजस्समा mujassamma

मुजस्समा खुद का मैंने ख्यालों में तराशा है

मुकम्मल है जो ख़्वाबों में, हकीकत में हताशा है 

मुझे न मिल सका वो शक़्स जो हर पहलू से उम्दा हो 

हज़ारों आइनों में मैंने उसी को ही तलाशा है 


तेरी शिद्दत, तेरी फितरत, तेरा जज़्बा ही सब कुछ है

हुस्न तेरा, अदा तेरी, ये जलवा तो तमाशा है


बस एक वो बात है मुझ में ज़माने से जो ऊपर है

मुझे तेरी ही रग रग से मुहब्बत बेतहाशा है 


हैवानों से क्या बोलें वो कड़वाहट ही चखते हैं 

वो क्या जानें के मीठापन तो चाहत का बताशा है  


मुक्तलिफ़ ज़ुबानों से ये दुनिया बट गयी ऐसे 

आशिकाना शायरी ही जुड़वाने की भाषा है 


Saturday, April 12, 2025

याद न करना yaad na karna

कभी ज़रुरत तुम्हें पड़े तो

हमारे दर को याद न करना

उजड़ रहा जो तुम्हारे गम में  

उस दिल को बर्बाद न करना

वही मुहब्बत जिसे दफन कर

आखिर अब हम संभल रहे हैं

उसी कब्र पे फूल चढ़ा कर

कोई नया फसाद न करना  

मुहब्बतों पे शेर लिखे थे

जफ़ाओं पे जो बली चढ़े हैं

महफिलों में कभी सुनो तो

मचल के फिर इरशाद न करना

बंधा के खुद को हम बेड़ियों में 

समझौतों में जो जी रहे हैं

इन बंधनों में सुकून है अब

इनसे तुम आज़ाद न करना

हुई है तुमसे जो भूल अब वो

सुधरने की गुंजाइश कम है

सुधारने का जो मन बने तो

मुआफी की फ़रियाद न करना 

कभी जो मुझसे नज़र मिले तो 

शर्म से आँखें झुकाना मत तुम

खता जो की है गिला तुम उसका

इन हरकतों के बाद न करना 


Sunday, March 2, 2025

तुम्हें पता क्या tumhein pata kya

तुम्हें पता क्या तुम्हारा आँचल

हवा को क्या क्या बता रहा है

तुम्हारे दामन से यूं लिपटके

वो राज़-ऐ-उल्फत जता रहा है

ये जो खज़ाना मासूमियत का

मुआशरों में नुमाइशी है 

उसी के पीछे छुपी शरारत 

ज़माने भर को दिखा रहा है


ये चिलमनों की तहें हटाकर   

कह जाती हो तुम जो एक नज़र में

उसी नज़र को जो हम पढ़ें तो

लगे है पूरा खत आ रहा है


इश्क़ और जंग में सही गलत क्या

रिवायतों से हम हैं मुखातिब 

सही सही की राह चले पर  

ख्याल मन में गलत आ रहा है


तुम्हारे गालों पे लट तुम्हारी 

ये हरकतें कर रहीं है कैसी 

सम्भालो ज़ुल्फ़ें इरादा इनका

सुलझे हुओं को उलझा रहा है 


हमारे शेरों में वो ज़राफ़त 

को सुनके तुमने इशारा समझा  

फिर जो तबस्सुम छुपाई तुमने

हमारा दिल मुस्कुरा रहा है 


गली से गुज़री झुकाये नज़रें  

सड़क पे शायद रही तवज्जु

पलट के देखा हमें तो समझे 

हमारा जादू भी छा रहा है

Thursday, October 17, 2024

वजह vajah

तय शुदा समय नहीं हो, कुछ उलझी गिरेह नहीं हो

तेरे पास वक़्त गुज़ारूं पर कुछ वजह नहीं हो


ये दूरी की दिक्कतें हैं  के मकसद को ढूंढ़ती हैं

किस बिना पे राब्ता हो जो वाजिब बिना नहीं हो


फासलों का खालीपन ये रातों में गूंजता है

ये सिलसिला रहेगा जब तक सुबह नहीं हो


मशग़ूलियत है तेरी और मेरी मुश्किलें हैं

ये तो कश्मकश रहेगी जब तक सुलह नहीं हो


ये मुआशरा है कैसा तुझे चाहना गुनाह है

कोई जगह तो हो जहां इश्क़ गुनाह नहीं हो 


लिख लिख के मैं कसीदे भरता हूँ डायरी में

लिखता रहूँ मैं जब तक आखरी सफह नहीं हों