Sunday, July 16, 2017

अंधेरों के खंजर

अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं
मेरी नाज़ुक कली मजबूर नहीं
जंग रोशनी की लड़ लेगी वो
घाव गहरे हैं मगर नासूर नहीं
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

पर्दों की साज़िश बिखरेगी कभी
कली फूल बनकर निखरेगी अभी
सूरज का कतरा हथिया लेगी वो
अभी हौंसले उसके चूर नहीं
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

रोशनी को सीने में बटोरेगी वो
धूप के गर्म प्यालों को पी लेगी वो
परछाइयों के गले काट देगी
अब ऐसा मंज़र भी दूर नहीं 
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

तेरे संग हैं सिम्मी आगे तू बढ़
हर मुश्किल से बेफिक्र हो कर तू लड़
हर गलत साये को आग लगा दे
जो ज़हन को जकड़े, बेक़सूर नहीं
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

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