Tuesday, April 14, 2020

शीशों की दीवार

रोशिनी मेरे कमरे 
में कम तो नहीं है
तेरी परछाइयों का ज़ालिम
पर ये सितम तो नहीं है 
मन टटोलता है
दूरियों के अँधेरे
कुछ लम्हों की मशाल
भी हाथ में है मेरे
गुफ्तगू की चिंगारियां 
ख़यालों में झूमती हैं
दीवानगी की जुगनी  
बंद घर में घूमती है 
ये घर भी कुछ अजीब है
के शीशों की दीवार है
घर में बहुत अज़ीज़ हैं
तू है, मगर उस पार है।

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