Wednesday, April 1, 2020

ज़हर


कैसा ये दौर है कैसा ये शहर है?
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़मीन तो खुश है आसमान चहकता है
जंगल जवां है बाग़ फिर महकता है
दरियाओं  में भी उमंग की लहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

छाती फैलाकर  दरख़्त तो बुलंद हैं
इंसानी इरादों का कारखाना बंद है
वक़्त की चाल में कैसा ये पहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

तितली नाचती है भवरा गुनगुनाता है
यार दूर रहते हैं मोर छत पे आता है
जुगनू की रात है परिंदों की सहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ख्वाहिश पे ताला  मंसूबों की हड़ताल  
ताकतों की शिकस्त कीटाणु का कमाल 
सवाल पूछते हैं मंथन है या कहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़हर हज़म कर या उगल दे बहार
कुदरत को दोष दे या खुद कर इकरार   
तेरी करतूतों की तुझ पर ही मेहर है
कैसा ये दौर हैcकैसा ये शहर है 
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

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