Wednesday, February 24, 2021

मसरूफ़ियत की ढाल

 

ये कैसे दुश्मनी है

मेरी मेरे ख्यालों से

मुहब्बतों में उलझे

अनकहे सवालों से

अक्सर रातें जाग कर 

ख़्वाबों से जूझती है

रोज़ अकेलेपन में ये

हाल-ए-दिल पूछती हैं

ये शतरंज की बिसात है 

अजीब-ओ-गरीब जंग है

मोहरे स्याह सफ़ेद हैं

चालों का और ही रंग है

हमला सब तरफ से है

तलवार कहीं तो भाल है

घायल हुआ ख्यालों से  

मसरूफ़ियत ही ढाल है


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