ये कैसे दुश्मनी है
मेरी मेरे ख्यालों से
मुहब्बतों में उलझे
अनकहे सवालों से
अक्सर रातें जाग कर
ख़्वाबों से जूझती है
रोज़ अकेलेपन में ये
हाल-ए-दिल पूछती हैं
ये शतरंज की बिसात है
अजीब-ओ-गरीब जंग है
मोहरे स्याह सफ़ेद हैं
चालों का और ही रंग है
हमला सब तरफ से है
तलवार कहीं तो भाल है
घायल हुआ ख्यालों से
मसरूफ़ियत ही ढाल है
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