Monday, June 20, 2022

मुलाकातों की खुशबू


मुलाकातों की  खुशबू में मेरे ये दिन  गुज़रते हैं

इत्तर तेरा महेकता है फक्र गुलज़ार करते हैं 

पुरानी है  वो खुशबू और वो किस्से भी पुराने हैं 

नए अलफ़ाज़ में उलझे ये शेरों में उमड़ते हैं 


चुराते हैं वो बारिश से तरी मिट्टी का सोंधापन 

तेरे अहसास के झोंके मेरी साँसों को भरते हैं 


अगरबत्ती की शिद्दत है तेरी यादों के धुंए में

के हम तो राख ही बनकर हर दिन यूं बिखरते हैं  

  

ये खुशबू ही तो ज़ालिम है हवाओं में मचलती है

मेरे तो ख्वाब इसी को ढून्ढ तरसते और निखरते हैं 


तेरी दुनियासे बिछड़े पल हैं जैसे आग में संदल 

उसी माफिक मेरे जज़्बात महक महक के मरते हैं 


मुलाकातों की खुशबू में मेरे तो दिन गुज़रते हैं

इत्तर तेरा महेकता है कई गुलज़ार संवरते हैं


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