ये मुख्तलिफ सी डोर हैं गाठें हज़ार हैं
कुछ महज़ सूत के कुछ रेशम के तार हैं
उलझे भी हैं, सुलझे भी ये कुरबतों के लच्छे
हर रंग में डूबी हुई कशिश का सार हैं
एक सिरे पे मैं खड़ा कुछ दूरी पे तू
डोरियों में मैं फंसा मजबूरी में तू
ये डोरियों का बंधन महीन और महका सा है
तेरे इत्र में मैं रमा कस्तूरी में तू
महके हुए नशे में एक दूजे को थाम
रेशमी डोरियों से बुन रहे मकाम
दिल पतंगा हो गया शम्मा को चाहता है
चाहत को अफ़साने का दे देंगे अंजाम
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