Thursday, September 8, 2022

कुरबतों के लच्छे

ये मुख्तलिफ सी डोर हैं गाठें हज़ार हैं

कुछ महज़ सूत के कुछ  रेशम के तार हैं 

उलझे भी हैं, सुलझे भी ये कुरबतों के लच्छे  

हर रंग में डूबी हुई  कशिश का सार हैं


एक सिरे पे मैं खड़ा कुछ दूरी पे तू  

डोरियों में मैं फंसा  मजबूरी में तू  

ये डोरियों का बंधन महीन और महका सा है 

तेरे इत्र में मैं रमा कस्तूरी में तू  

 

महके हुए नशे में एक दूजे को थाम

रेशमी डोरियों से बुन रहे मकाम 

दिल पतंगा हो गया शम्मा को चाहता है 

चाहत को अफ़साने का दे देंगे अंजाम 

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