रफ़्तार कारवां की
अब कम हो चली है
जद्दोजहद सब
हज़म हो चली है
देते थे सराब
मकसद-ऐ-ज़िन्दगी
अब ज़िन्दगी खुद
वहम हो चली है
लुत्फ़ आशिकी के
माशूक संग मनाये
ये माशूक किसीकी
बेगम हो चली है
इत्र की मिलावट
साँसों में याद उनकी
कम्बख्त याद अब वो
मरहम हो चली है
देखते थे सपने
दोनों जिस नज़र से
उम्र संग नज़र भी
कुछ नम हो चली है
संजीव क्या लिख्खे
मसले सब तरफ हैं
ये कायनात मेरी
कलम हो चली है
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