Saturday, April 20, 2024

रफ़्तार कारवां की raftaar kaarvaan ki

 रफ़्तार कारवां की

अब कम हो चली है

जद्दोजहद सब  

हज़म हो चली है

देते थे सराब

मकसद-ऐ-ज़िन्दगी

अब ज़िन्दगी खुद 

वहम हो चली है

लुत्फ़ आशिकी के

माशूक संग मनाये

ये माशूक किसीकी 

बेगम हो चली है

इत्र की मिलावट

साँसों में याद उनकी 

कम्बख्त याद अब वो

मरहम हो चली है

देखते थे सपने

दोनों जिस नज़र से

उम्र संग नज़र भी

कुछ नम हो चली है

संजीव क्या लिख्खे 

मसले सब तरफ हैं 

ये कायनात मेरी

कलम हो चली है 


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