Monday, June 24, 2024

नफरत की देहलीज़ nafrat ki dehleez

नफरत की देहलीज़ पे

कितने तबाह हुए 

सदियों की तारीख में

क्या क्या गुनाह हुए

नफरत को क्या कोसें 

कुछ मज़हबी इश्क़ के 

खुशवहमी ख्याल में 

पूरे फनाह हुए


भरे बाज़ार ज़ुल्म को

रोकें तो किस तरह 

मूक, बधिक और अंधे

सारे गवाह हुए


टीस उठे जब दर्द की

बेबस रुलाई में

गैरों का शोक मानकर 

सब बेपरवाह हुए

 

किसने किसकी जान ली

हुआ पहला वार क्यों 

अफवाहों की भीड़ में 

हम खुद अफवाह हुए


जो लड़ रहा है सोच 

तुझे हांकता है कौन 

कौन चाहता है जंग ये

बिना सुलह हुए 


बैठे दूर दराज़ जो 

चिंगारी को दें फूंक 

दरबार-ऐ-हार-जीत में   

वो जहाँपनाह हुए

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