नफरत की देहलीज़ पे
कितने तबाह हुए
सदियों की तारीख में
क्या क्या गुनाह हुए
नफरत को क्या कोसें
कुछ मज़हबी इश्क़ के
खुशवहमी ख्याल में
पूरे फनाह हुए
भरे बाज़ार ज़ुल्म को
रोकें तो किस तरह
मूक, बधिक और अंधे
सारे गवाह हुए
टीस उठे जब दर्द की
बेबस रुलाई में
गैरों का शोक मानकर
सब बेपरवाह हुए
किसने किसकी जान ली
हुआ पहला वार क्यों
अफवाहों की भीड़ में
हम खुद अफवाह हुए
जो लड़ रहा है सोच
तुझे हांकता है कौन
कौन चाहता है जंग ये
बिना सुलह हुए
बैठे दूर दराज़ जो
चिंगारी को दें फूंक
दरबार-ऐ-हार-जीत में
वो जहाँपनाह हुए
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