Sunday, June 16, 2024

मेरी लिखावट meri likhaavat

तलाशा है 

ज़माने ने

मुझे मेरी

लिखावट में

उलझे फिर  

रहे हज़रात

ये लव्ज़ों की

सजावट में


नहीं समझे 

के मकसद और 

है सुनने

सुनाने का 


वो तहखाना 

तुम्हारा है

ये शेरों की

इमारत में 


भरी महफ़िल

में सुनते हो

वो किस्से जिस 

खुदाई के


सजदा उस को  

तुम करते हो  

छुप छुप कर

इबादत में


मेरे शेरों

की वाह वाही 

जो करते हो 

तहे दिल से 


है अरमानों 

की जिरह वो 

तुम्हारी ही

वकालत में


कभी मरहूम

मुहब्बत हो

हो एक तरफ़ा 

कभी वो इश्क़


है मरहम का 

सौदा नज़्म 

जो पढ़ता मैं 

तिजारत में 


कभी हो ज़ुल्म

अज़ीज़ों पर 

हुकूमत की

बदौलत तो 


जज़्बे को मैं

करता सख्त 

सुनाकर शेर

बग़ावत में 


तुझे ओ हुस्न

जो करती है

मुझपर ज़ुल्म

ही दिन-बर-दिन


लिखे लहू 

से दिल पर शेर

नज़र तुझपर

सदाकत में 

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