सियासती ये घाव हैं जो
दरियाओं से गहरे हैं
कहने को तो कुछ भी नहीं
बस सजे हुए कुछ सेहरे हैं
न जाने कितनी नस्लें
फुँक जाएँगी जंगों में
न जाने कितने रिश्ते
लुट जायेंगे दंगों में
तेल से सस्ता खून है और
सने हुए सब चेहरे हैं
सियासती ये घाव हैं जो
दरियाओं से गहरे हैं
हैवानों की फितरत है
हमलावरों के दिल में
आग-ओ-बारूद लिक्खा है
इन सब के मुस्तकबिल में
जिस सदी में ये शुरू हुआ
ये उस ही सदी में ठहरे हैं
सियासती ये घाव हैं जो
दरियाओं से गहरे हैं
इंसां से इंसां प्यार करे
हर मज़हब यही सिखाता है
पर ये कैसा इंसां है
जो और ही रंग दिखलाता है
नफरत के बाज़ार लगाके
मुहब्बत्तें पे पहरे हैं
सियासती ये घाव हैं जो
दरियाओं से गहरे हैं
गुरूर है जिसको ताकत पर
मत भूल के वक़्त बदलता है
जो आज हँसे इन कब्रों पर
उसका भी सूरज ढलता है
सुनेंगे खुद की चीखें वो
जो आज के शोर में बेहरे हैं
सियासती ये घाव हैं जो
दरियाओं से गहरे हैं
मलबे और राख के सौदागर
धुंआ धुंआ हो जायेंगे
सोने और तेल के लालच में
वो रेत के टीले पाएंगे
खून से लथपथ होंगे वो
सपने जो आज सुनहरे हैं
सियासती ये घाव हैं जो
दरियाओं से गहरे हैं
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