Wednesday, May 27, 2026

ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम zindagi ke bojh ka

गुज़र रही है रात भी

चल रही है बात भी

खुद से ही झगड़ रहे

गरेबान पकड़ रहे

अपनों से परे परे 

सपनों के क़त्ल करे

सुबह की थकान का हैं इंतज़ार हम 

ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम 

पाई पाई जोड़कर

अपनी कमर तोड़कर

रिश्तों को बना बना

हाथों को सना सना 

अपनी भूख मारकर

हर पड़ाव पार कर

अपने शहर-ऐ-सुकून से हैं फरार हम 

ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम 

प्यार तो बहुत मिला

इसका करें क्या गिला

पर एक हसीन दौर था 

उसका मज़ा और था

अब भी वो सुरूर है 

ये दिल नशे में चूर है 

यूं अपने ही ढकोसले के बन गए शिकार हम 

ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम 

नाकामियों का शोर है

दिल में छिपा चोर है 

जो भी मुम्किनात था

क्या उसका दिया साथ था

भटक गए इरादों से

खुद से किये वादों से

खुद अपने घर के ही बने हैं ख़लफ़शार हम

ज़िन्दगी के बोझ का उठा रहे हैं भार हम

No comments:

Post a Comment