Sunday, May 5, 2019

गर्म हवाएं

किसी रेगिस्तान पे रेंगती हुई
चली आती हैं गर्म हवाएं
सर पटकती हैं मेरे एयर कंडिशन्ड 
कमरों की खिड़कियों पर
नाचती हैं धूल के संग 
खाली मैदानों पे
एक ज़माना था खस की टाटों पे
प्यास बुझा लेती थी अपनी
दरख्तों की हरियाली में सुस्ता कर
कर लेतीं थी अपना गुस्सा ठंडा
अब ये गुस्सा मुझ पर बरसता है
कुदरत से बैर कर मैं
कुछ कमज़ोर हो गया हूँ
और वो आज हो गयीं मुझपे हावी. 

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