वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव
मुझे कुचल के जाते हैं
तुम खड़े रहना
अपनी बाहें फैलाए
मैं न सही मेरे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं
मेरी ख्वाहिशों से कहीं आगे
निकल गयी यह उम्र
अब इन फासलों से ही सही
पर हम इश्क़ खूब निभाते हैं
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