मसला इतना गंभीर नहीं
चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं
इज़हार-ए-मुहब्बत तो है पर
कोई पत्थर पे लकीर नहीं
मौसम बदलते हैं दिल के
तू चार कदम तो चल मिल के
इसमें तो कुछ तक़रीर नहीं
मसला इतना गंभीर नहीं
बहक जाते हैं सबके मन
तू भी दिखाले अपनापन
मैं संत नहीं तू पीर नहीं
मसला इतना गंभीर नहीं
तौबा के ये हालात मिलें
के इश्क़ मुझे खैरात मिले
आशिक़ हूँ मैं, फ़क़ीर नहीं
मसला इतना गंभीर नहीं
चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं
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